2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में फॉर्मूलों की कैसी राजनीति?
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कहा जाता है कि Politics is game of Perception. राजनीति धारणा का खेल है. आजादी के बाद से हमारे नेता इस खेल को बखूबी खेलते आए हैं. इस खेल के दम पर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते और उतरते आए हैं.
आम वोटर के बीच सियासी धारणा बनाने के कई तरीके होते हैं. कभी नारों या विरोध प्रदर्शन के बहाने कोई खास परसेप्शन बनाने की कोशिश की जाती है.
कभी कोई ऐसा फॉर्मूला या सूत्र गढ़ा जाता है जिसके जरिए जनता के दिमाग में कोई बात विशेष बिठाने की कोशिश की जाती है.
उत्तर प्रदेश में लगभग 3 महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी परसेप्शन या धारणा बनाने का ट्रेंड जोरों पर है.
यहां की चुनावी जमीन पर अलग-अलग नेता और पार्टियां अपने-अपने फॉर्मूला के जरिए जनता को साधने की कोशिश कर रही हैं. इनमें सबसे पॉपुलर फॉर्मूला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का है. ये फॉर्मूला है 80-20.
80-20 वाला फॉर्मूला सीएम योगी या बीजेपी की राजनीति को काफी सूट करता है.
इस फॉर्मूले में 80 से मतलब उत्तर प्रदेश की 80 फीसदी हिंदू आबादी से है और 20 फीसदी मुसलमानों की आबादी को पारिभाषित करता है. क्योंकि सीएम योगी की राजनीति का आधार उनका ब्रैंड हिंदुत्व है.
यही वजह है कि इस फॉर्मूला की बदौलत वो ध्रुवीकरण का दांव आजमाते हैं.
दरअसल सीएम योगी आदित्यनाथ का ये फॉर्मूला उनके या बीजेपी के धार्मिक समीकरणों पर आधारित है.
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 80-20 वाले फॉर्मूला के जवाब में 95-5 का सूत्र दिया है. 95 फीसदी में वो अपने पीडीए प्रयोग की जाति या वर्ग को रखते हैं जिनमें पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक शामिल हैं.
दूसरी तरफ 5 फीसदी को वर्चस्ववादियों के तौर पर पारिभाषित करते हैं.
इस फॉर्मूला के पीछे यूपी की जातियों का जोड़ है जिसे अखिलेश यादव पीडीए का नाम देते हैं.
इस जाति फॉर्मूला के सहारे ही अखिलेश यादव 2027 में सरकार बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
गौर करने वाली बात ये है कि य
📡 स्रोत: ABP Live