30 दिन में बूथ तक पहुंचें, नाराज कार्यकर्ताओं से मिलें:जिलाध्यक्ष की मुसीबत नहीं बनें; विधानसभा प्रभारियों के लिए कांग्रेस की गाइडलाइन
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →एमपी विधानसभा चुनाव में भले ही दो साल का वक्त बचा हो, लेकिन कांग्रेस चुनावी हिसाब से बिसात बिछाने लगी है। कांग्रेस ने सभी 230 विधानसभा सीटों के प्रभारियों के लिए इंटरनल गाइड लाइन बनाई है। इसमें प्रभारियों की जॉब रिस्पॉन्सिबिलिटी तय की गई है। संगठन की मजबूती की निगरानी भोपाल या जिला स्तर की बैठकों से नहीं, बल्कि विधानसभा क्षेत्र और बूथ स्तर से की जाएगी।
पार्टी ने विधानसभा प्रभारियों की जिम्मेदारियां तय करते हुए उन्हें 30 दिन में अपनी-अपनी विधानसभा सीट का पूरा संगठन खंगालने के निर्देश दिए हैं। प्रभारी सिर्फ पदाधिकारियों से रिपोर्ट नहीं लेंगे, बल्कि ब्लॉक, मंडल, पंचायत, बूथ और कार्यकर्ताओं के बीच जाकर संगठन की वास्तविक स्थिति समझेंगे।
सबसे अहम बात यह है कि विधानसभा प्रभारियों को यह पता करना होगा कि कौन-सा बूथ सक्रिय है?
कौन-सा निष्क्रिय है? कौन-से कार्यकर्ता काम कर रहे हैं? कहां संगठन सिर्फ कागजों पर चल रहा है?
इसके बाद वे इसकी रिपोर्ट जिला अध्यक्ष और जिला प्रभारी के साथ साझा करेंगे। 30 दिन के काम की अलग रिपोर्ट प्रदेश कांग्रेस को देंगे। ‘प्रभारी बनाम जिला अध्यक्ष’ की स्थिति नहीं बनने देगी कांग्रेस इस व्यवस्था का एक अहम हिस्सा यह है कि विधानसभा प्रभारी और जिला संगठन के बीच अधिकारों को लेकर टकराव न हो। दस्तावेज में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि प्रभारी की भूमिका समन्वय एवं फॉलो-अप की होगी, यानी प्रभारी को संगठन की समस्या पकड़नी है, संबंधित नेतृत्व तक पहुंचानी है और समाधान का फॉलो-अप करना है; खुद संगठन में समानांतर निर्णय नहीं लेने हैं। अब प्रभारी पूछेंगे- बूथ पर संगठन कर क्या रहा है?
कांग्रेस की गाइड लाइन में विधानसभा प्रभारी की भूमिका को बैठक लेने तक सीमित नहीं रखा गया है। उन्हें पंचायत और वार्ड अध्यक्षों से संवाद करना होगा। बूथ समितियों की सक्रियता देखनी होगी और स्थानीय राजनीतिक स्थिति समझनी होगी, यानी अब प्रभारी के सामने सिर्फ यह रिपोर्ट पर्याप्त नहीं होगी कि 'बूथ समिति गठित है'।
उन्हें यह देखना होगा कि समिति जमीन पर सक्रिय भी है या नहीं। पुराने नेताओं से लेकर नाराज कार्यकर्ताओं तक पहुंचेंगे विधानसभा प्रभारी 30 दिन में अलग-अलग वर्ग के कार्यकर्ताओं से संवाद करेंगे। इसमें वरिष्ठ कांग्रेस नेता, पुराने संगठन पदाधिकारी, युवा और महिला कार्यकर्ता, एससी-एसटी कार्यकर्ता, किसान कार्यकर्ता, एनएसयूआई और युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता शामिल हैं।
इसके अलावा निष्क्रिय या नाराज कार्यकर्ताओं से भी बात करने को कहा गया है। इसका मकसद साफ है कार्यकर्ता की समस्या सुनो, संगठन को बताओ और समाधान का फॉलो-अप करो। गुटबाजी और विवाद भी रिपोर्ट में आएंगे विधानसभा प्रभारी को स्थानीय संगठन के भीतर गुटबाजी, कार्यकर्ताओं के बीच मतभेद, पदाधिकारियों के विवाद, आपसी समन्वय की कमी और निष्क्रिय पदाधिकारियों की जानकारी भी जुटानी होगी, लेकिन प्रभारी खुद समानांतर संगठन नहीं चलाएगा।
दस्तावेज में स्पष्ट निर्देश है कि वह जिला अध्यक्ष का विकल्प नहीं है। ऐसे मामलों में उसकी भूमिका समन्वय और फॉलो-अप की होगी और जरूरत पड़ने पर मामला जिला नेतृत्व के संज्ञान में लाया जाएगा। ‘पॉलिटिकल पल्स’ पकड़ेंगे प्रभारी कांग्रेस ने विधानसभा प्रभारियों को अपनी विधानसभा का राजनीतिक मिजाज समझने की जिम्मेदारी भी दी है।
उन्हें पता करना होगा कि जनता के प्रमुख मुद्दे क्या हैं, सरकार के प्रति स्थानीय धारणा कैसी है, कांग्रेस के प्रति कार्यकर्ताओं की धारणा क्या है, विपक्षी दल क्या गतिविधियां कर रहे हैं, युवाओं और महिलाओं के मुद्दे क्या हैं तथा किसान-मजदूरों से जुड़े स्थानीय सवाल कौन से हैं। मतलब प्रदेश नेतृत्व अब विधानसभा प्रभारी के जरिए यह जानना चाहता है कि विधानसभा में राजनीतिक माहौल वास्तव में क्या है।
प्रदेश का कार्यक्रम बूथ तक पहुंचाना होगा प्रदेश कांग्रेस जब भी आंदोलन, जनसभा, पदयात्रा, जनसंवाद, किसान, छात्र, महिला या युवा कार्यक्रम घोषित करेगी, उसे विधानसभा से बूथ और कार्यकर्ता स्तर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी प्रभारी की होगी। प्रभारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदेश का कार्यक्रम केवल जिला कार्यालय की बैठक या कागज तक सीमित न रह जाए।
30 दिन बाद हिसाब देना होगा 30 दिन पूरे होने पर विधानसभा प्रभारी को नई कार्य योजना नहीं, बल्कि 'स्थिति एवं कार्य निष्पादन रिपोर्ट' देनी होगी। इसमें 5 चीजें बतानी होंगी- विधानसभा में संगठन की मौजूदा स्थिति, 30 दिन में किए गए काम, संगठन की प्रमुख समस्याएं, प्रदेश नेतृत्व से अपेक्षित हस्तक्षेप और आगे के लिए सुझाव।
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📡 स्रोत: NewsData.io