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900 साल से अधिक पुराना कैलादेवी मंदिर, चैत्र मेले में दिखता है लघुकुंभ जैसा नजारा

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 11 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
900 साल से अधिक पुराना कैलादेवी मंदिर, चैत्र मेले में दिखता है लघुकुंभ जैसा नजारा

राजस्थान के प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल है कैलामाता का दरबार, देशभर से पहुंचते हैं श्रद्धालु, लांगुरिया गीतों और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी है आस्था

करौली, 11 अक्टूबर। राजस्थान के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल कैलादेवी धाम श्रद्धा, भक्ति और प्राचीन परंपराओं का प्रमुख केंद्र है। करौली जिला मुख्यालय से करीब 23 किलोमीटर दूर त्रिकूट पर्वत पर स्थित इस मंदिर में सालभर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं, जबकि चैत्र लक्खी मेले में देशभर से लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

मेले के दौरान पूरे क्षेत्र में लघुकुंभ जैसा माहौल दिखाई देता है। शारदीय नवरात्र के अवसर पर कैलादेवी मंदिर में विधि-विधान, मंत्रोच्चारण और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ घट स्थापना की गई। मंदिर के सोल ट्रस्टी एवं पूर्व नरेश कृष्ण चंद्रपाल ने राजऋषि पंडित प्रकाश जती के निर्देशन में घट स्थापना संपन्न कराई।

नवरात्र के आगाज के साथ ही मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और माता के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया।

कैलादेवी मंदिर का इतिहास 900 साल से अधिक पुराना माना जाता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, मां कैलादेवी की प्रतिमा की स्थापना वर्ष 1114 ईस्वी में महात्मा केदार गिरि ने की थी। इसके बाद वर्ष 1116 में तत्कालीन खींची शासक मुकुंद दास ने यहां छोटे मंदिर का निर्माण कराया। वर्ष 1153 में रघुनाथ दास खींची ने मंदिर का विस्तार करवाया, जबकि वर्ष 1753 में राजा गोपाल सिंह ने भी इसके विकास में योगदान दिया।

करौली के यदुवंशी शासकों ने समय-समय पर मंदिर की देखरेख और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंदिर में मां कैलादेवी के साथ मां चामुंडा की प्रतिमा भी विराजमान है। राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और गुजरात सहित देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु यहां दर्शन करने पहुंचते हैं।

कैलादेवी मंदिर में नवरात्र के दौरान पूजा-अर्चना और शृंगार की विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं। चैत्र नवरात्र में घट स्थापना के समय माता को विशेष पोशाक और पुराने आभूषण धारण कराने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार, घट स्थापना से अष्टमी पूजन तक माता के वस्त्र और शृंगार नहीं बदले जाते। अष्टमी पूजन के बाद माता को नई पोशाक धारण कराई जाती है।

नवरात्र के दिनों में श्रद्धालु माता के दर्शन कर विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान करते हैं। भक्तों के लिए यह समय धार्मिक आस्था के साथ पारिवारिक मंगलकामनाओं का भी विशेष अवसर होता है।

कैलादेवी धाम से कई पारिवारिक और सामाजिक परंपराएं भी जुड़ी हुई हैं। मान्यता है कि पुत्र के विवाह और बच्चे के जन्म के बाद नवविवाहित जोड़ा माता के दरबार में पहुंचकर धोक लगाता है। बच्चों का पहला मुंडन संस्कार कराने के लिए भी बड़ी संख्या में परिवार यहां आते हैं। चैत्र मेले के दौरान महिलाएं सुहाग के प्रतीक के रूप में हरी चूड़ियां और सिंदूर खरीदती हैं।

इन परंपराओं के चलते कैलादेवी की यात्रा केवल धार्मिक दर्शन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह श्रद्धालुओं की पारिवारिक आस्था और लोक संस्कृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। कैलादेवी मेले की पहचान यहां गूंजने वाले लांगुरिया गीतों से भी है। मेले के दौरान मंदिर परिसर और आसपास के कस्बे में ढोल-नगाड़ों के साथ महिला और पुरुष श्रद्धालु भक्ति गीतों पर नृत्य करते नजर आते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भैरव को माता का भक्त लांगुरिया कहा जाता है। माता के दर्शन के बाद लांगुरिया पूजन की परंपरा भी निभाई जाती है।

मंदिर परिसर में बोहरा भगत का मंदिर भी स्थित है। श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि बोहरा भगत के दर्शन के बिना माता की यात्रा अधूरी रहती है। इसी मान्यता के चलते भक्त माता के दर्शन के साथ बोहरा भगत के मंदिर में भी शीश नवाते हैं। कैलादेवी कस्बे में देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए 600 से अधिक धर्मशालाएं बनी हुई हैं।

इनमें से अधिकांश का निर्माण भक्तों ने यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था के उद्देश्य से कराया है। चैत्र लक्खी मेले के दौरान इन धर्मशालाओं में बड़ी संख्या में श्रद्धालु ठहरते हैं। धार्मिक आयोजनों, पारंपरिक मान्यताओं, लांगुरिया गीतों और विशाल जनसमूह के कारण कैलादेवी धाम का मेला राजस्थान की विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।

प्राचीन इतिहास और लोक परंपराओं को संजोए यह शक्तिपीठ आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

बाइट : 1प्रकाश शर्मा जती राज ऋषि और पंडित

बाइट : 2 प्रदीप त्रिवेदी पीला कुर्ता, प्रबंधक कैलादेवी मंदिर

बाइट :3 प्रदीप जोशी श्रद्धालु

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan जनता का संदेश के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।