'अगर तीनों मनमानी करेंगे तो क्या', SC में EC के हलफनामे पर कांग्रेस नेता के सवाल
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चुनाव आयोग की तरफ से SIR पर लिए गए फैसले और CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज के खिलाफ दायर विपक्ष की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए जवाबी हलफनामा को लेकर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने सवाल उठाया है.
उन्होंने कहा कि अगर तीनों चुनाव आयुक्तों ने संयुक्त रूप से फैसला लिया भी था, तब भी सवाल फॉर्म-6 का है. यह बात तो नियमों की है. अगर तीनों ने मिलकर मनमानी की, तब भी तो वो मनमानी ही कहलाएगी.
उन्होंने कहा कि हमें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि किस चुनाव आयुक्त ने क्या कहा है, ये हमारा मुद्दा ही नहीं है.
वहीं, राहुल गांधी की तरफ से चुनाव आयोग के SIR पर लिए गए फैसलों को मनमाना बताए जाने पर इमरान मसूद ने कहा कि आखिर मनमाना होता है, मनमाना तो नियमों के विपरीत ही हो गया, तो सवाल यह है कि फैसले नियमों के तहत लिए गए हैं या नहीं?
असल मसला तो फॉर्म-6 और वोट कटने का है- इमरान
न्यूज एजेंसी एएनआई के साथ बातचीत में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा, चाहे फैसला किसी एक ने लिया या तीनों ने मनमाने ढंग से लिया, तो अगर तीनों भी मनमानी करेंगे तो क्या वो मनमानी नहीं होगी?
असल मसला तो फॉर्म-6 का है.
#WATCH | Delhi: On Election Commission's affidavit, Congress MP Imran Masood says, "The Supreme Court should summon all the relevant records; even if all three agreed, the core issue remains 'Form 6'.
If all three made an incorrect decision, then it is still wrong, isn't it? The issue is about adherence to the rules. We are not concerned with what any individual. The question concerns 'Form 6'.
The question concerns the deletion of votes. How could the issue be resolved? The Election Commissioner is not the issue here. The issue is the theft of votes..."
ANI (@ANI) October 26, 2026
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📡 स्रोत: ABP Live
💡 पृष्ठभूमि (Background)
यह खबर चुनाव आयोग के चुनाव आयुक्तों द्वारा लिए गए निर्णय और उनके हलफनामे पर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के जवाब में उठाए गए सवालों से जुड़ी है। यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और न्यायिक निरीक्षण की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। यदि आयुक्तों की निर्णय प्रक्रिया में मनमानी पाई जाती है, तो इससे चुनावी परिणामों पर विश्वास घट सकता है और आम जनता को चुनावी शिकायतों को हल करने के लिए वैध मार्गों की आवश्यकता महसूस होगी।