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अजमेर में 99 साल से मां दुर्गा की पूजा, देखें ‘मिनी बंगाल’ की झलक

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 15 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
अजमेर में 99 साल से मां दुर्गा की पूजा, देखें ‘मिनी बंगाल’ की झलक

अजमेर में बंगाली समाज 16 अक्टूबर से अपना 99वां दुर्गा पूजा महोत्सव मनाएगा, जहां कोलकाता की परंपराओं के अनुसार मां दुर्गा की पूजा होगी। मिट्टी, घास-फूस और लकड़ी से बनी इको-फ्रेंडली प्रतिमाएं इस आयोजन का मुख्य आकर्षण हैं, जिसमें करीब 200 बंगाली परिवार शामिल होंगे।

अजमेर, 15 अक्टूबर। राजस्थान के अजमेर में बंगाली समाज अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को सहेजते हुए इस वर्ष 99वां दुर्गा पूजा महोत्सव मनाने जा रहा है। कचहरी रोड स्थित बंगाली हिंदू धर्मशाला में पश्चिम बंगाल की तर्ज पर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाएगी। इस आयोजन में शहर के करीब 200 बंगाली परिवार एकजुट होकर धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का निर्वहन करेंगे।

इस महोत्सव का सबसे खास आकर्षण मां दुर्गा की इको-फ्रेंडली प्रतिमाएं हैं। इन्हें मिट्टी, घास-फूस और लकड़ी जैसी प्राकृतिक सामग्री से तैयार किया जाता है, ताकि विसर्जन के दौरान पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे। बंगाली हिंदू समाज के कोषाध्यक्ष राजेंद्र कुमार के अनुसार, पिछले 99 वर्षों से एक ही परिवार के सदस्य इन प्रतिमाओं का निर्माण करते आ रहे हैं।

संगठन सचिव आर.के. गांगुली ने बताया कि प्रतिमाएं तैयार करने के लिए कारीगर कोलकाता के पास हावड़ा क्षेत्र से अजमेर आते हैं। ये कारीगर करीब ढाई महीने यहां रहकर प्रतिमाओं को तैयार करते हैं। प्रतिमाओं के लिए विशेष मिट्टी, वस्त्र और आभूषण भी कोलकाता से लाए जाते हैं, जिन्हें स्थानीय मिट्टी के साथ मिलाकर अंतिम रूप दिया जाता है। इस प्रक्रिया में बंगाल की पारंपरिक मूर्तिकला और कलात्मक शैली की झलक देखने को मिलती है।

1928 से धर्मशाला में हो रहा सार्वजनिक आयोजन

अजमेर में बंगाली समाज के सामूहिक कार्यक्रमों का इतिहास एक सदी से भी अधिक पुराना है। समाज से जुड़ी जानकारी के अनुसार, वर्ष 1891 में स्वामी विवेकानंद के अजमेर आगमन के दौरान अमरनाथ चटर्जी से समाज के सामूहिक कार्यक्रमों के लिए धर्मशाला बनाने की चर्चा हुई थी। इसके बाद समाज के लोगों ने 1919 में जमीन खरीदी और 1920 में धर्मशाला का निर्माण करवाया।

शुरुआत में मां दुर्गा की पूजा घरों में की जाती थी, लेकिन वर्ष 1928 से इसे धर्मशाला में सार्वजनिक रूप से मनाया जाने लगा। उस समय पूजा में करीब 50 से 60 लोग शामिल होते थे। आज यह आयोजन बढ़कर लगभग 200 बंगाली परिवारों की भागीदारी तक पहुंच गया है।

16 अक्टूबर से शुरू होगा महोत्सव

बंगाली हिंदू धर्मशाला कमेटी के अध्यक्ष देवाशीष विश्वास के अनुसार, यह राजस्थान में बंगाली समाज की पहली और सबसे पुरानी दुर्गा पूजा है। अगले वर्ष यह आयोजन अपने 100 साल पूरे करेगा।

इस वर्ष महोत्सव की शुरुआत 16 अक्टूबर को कल्पारंभ और आनंद मेले के साथ होगी। 17 अक्टूबर को नवपत्रिका प्रवेश और मां दुर्गा की स्थापना की जाएगी। इसके बाद सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना, भोग और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए समाज के सदस्य कई महीनों से रिहर्सल कर रहे हैं। 21 अक्टूबर को दर्पण विसर्जन और सिंदूर दान की रस्म के साथ महोत्सव का समापन होगा।

इस आयोजन में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी उत्साह से हिस्सा लेते हैं। समाज के बाहर के लोग भी इस उत्सव में शामिल होकर बंगाल की संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक आस्था से रूबरू होते हैं। करीब एक सदी से जारी यह परंपरा अजमेर में बंगाली समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक एकता का प्रतीक बनी हुई है।

बाइट - राजेंद्र कुमार

बाइट - आर के गांगुली

बाइट - देवाशीष विश्वास

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan जनता का संदेश के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।