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अजरबैजान के स्कूलों में हिजाब बैन, छात्राओं ने बायकॉट किया: 96% आबादी मुस्लिम, सरकार ने फिर भी बदला ड्रेस कोड; पड़ोसी देश तुर्किये में भी प्रदर्शन

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 13 अक्टूबर 2026 👁️ 1 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: जनता का संदेश
अजरबैजान के स्कूलों में हिजाब बैन, छात्राओं ने बायकॉट किया:  96% आबादी मुस्लिम, सरकार ने फिर भी बदला ड्रेस कोड; पड़ोसी देश तुर्किये में भी प्रदर्शन

अज़रबैजान में स्कूलों में हिजाब पहनने को लेकर विवाद तेज़ हो गया है, जहाँ सरकार ने ड्रेस कोड में बदलाव कर ऐसे कपड़ों पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे कई छात्राएँ और शिक्षिकाएँ कक्षा में प्रवेश से रोकी गईं, और विरोध में बहिष्कार व प्रदर्शन शुरू हुए।

नए नियमों के अनुसार, स्कूलों में किसी भी ऐसे वस्त्र को अनुमति नहीं दी जाएगी, जिसे सरकार धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मानती है। इस बदलाव के बाद, हिजाब पहने हुए छात्राएँ और शिक्षिकाएँ कक्षा में प्रवेश से मना कर दी गईं, जिससे कई स्कूलों में कक्षाओं का बहिष्कार हुआ। विरोध करने वाली छात्राओं ने पोस्टर लगाकर कहा, "हिजाब कोई पाप नहीं, बल्कि फरिश्ता है," और अपने धार्मिक अधिकारों की रक्षा की मांग की।

अज़रबैजान की जनसंख्या का लगभग 96 % खुद को मुस्लिम मानता है, जिसमें शिया और सुन्नी दोनों प्रमुख हैं। हालांकि, संविधान देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित करता है और सभी को अपने धर्म को मानने की स्वतंत्रता देता है। इस कारण सरकार ने सभी छात्रों पर समान ड्रेस कोड लागू करने का दावा किया, जबकि विरोध करने वाले तर्क देते हैं कि हिजाब पहनना व्यक्तिगत धार्मिक आस्था का मामला है, न कि सार्वजनिक नीति का।

स्थानीय मीडिया के अनुसार, कम से कम दो स्कूलों में छात्राओं ने कक्षाओं का बहिष्कार किया और स्कूल के प्रांगण में रोते हुए प्रवेश से रोके जाने की घटनाएँ दर्ज हुईं। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में दिखाया गया कि हिजाब पहने छात्राएँ प्रवेश से रोके जाने पर शिक्षिकाओं से गले मिलती और आँसू बहाते हुए बाहर निकलती हैं। यह दृश्य सार्वजनिक भावना को और अधिक उकसा रहा है।

शिक्षिका ज़हरा हसनोवा ने अल जज़ीरा को बताया कि उन्हें स्कूल में हिजाब पहनकर आने की अनुमति नहीं होने की सूचना दी गई थी। उन्होंने कहा कि हिजाब पहनना निजी फैसला है और इसे पहनना या उतारना व्यक्ति की अपनी पसंद होनी चाहिए। इस बयान ने हिजाब प्रतिबंध को व्यक्तिगत अधिकारों के उल्लंघन के रूप में उजागर किया।

अज़रबैजान के जेल में बंद पत्रकार पोलाद असलानोव ने भी इस नियम के विरोध में भूख हड़ताल शुरू की। असलानोव को 2020 में देशद्रोह के मामले में दोषी ठहराया गया था और वह 113 साल की सजा काट रहे हैं। उनकी पत्नी गुलमीरा असलानोवा ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि असलानोव जेल में रहते हुए भी संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं।

सरकार ने इस विवाद पर अभी तक आधिकारिक बयान नहीं दिया, लेकिन पुलिस ने बताया कि हिजाब प्रतिबंध के उल्लंघन की शिकायत मिलने पर स्कूल प्रशासन को कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। कुछ स्कूलों में प्रवेश से रोके जाने के बाद, स्थानीय पुलिस ने स्थिति को शांत करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए हैं। अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है, पर जांच जारी है।

इंटरनेट बंद करने की अफवाहें भी सामने आईं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय निगरानी संगठनों ने पुष्टि नहीं की है। तुर्की में भी अज़रबैजान के वाणिज्य दूतावास के बाहर प्रदर्शन हुए, जहाँ लोग इस फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग कर रहे हैं। कुछ तुर्की नागरिक इस मुद्दे को 1997 के हिजाब प्रतिबंध से तुलना कर रहे हैं, जब विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरियों में हिजाब पहनने वाली महिलाओं को रोकना सामान्य था।

यह विवाद अज़रबैजान के सामाजिक और प्रशासनिक माहौल को प्रभावित कर रहा है। धार्मिक बहुलता और धर्मनिरपेक्ष संविधान के बीच टकराव ने छात्रों, शिक्षकों और नागरिक समाज को विभाजित कर दिया है। विरोध प्रदर्शन ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया है, जिससे पड़ोसी देशों के बीच भी इस मुद्दे पर चर्चा बढ़ी है।

आगे की स्थिति अनिश्चित है; यदि सरकार ड्रेस कोड में लचीलापन नहीं दिखाती, तो छात्राओं और नागरिक समूहों द्वारा बड़े पैमाने पर बहिष्कार और प्रदर्शन जारी रह सकते हैं। दूसरी ओर, यदि संवाद के माध्यम से कोई समझौता हो जाता है, तो हिजाब प्रतिबंध को संशोधित या अपवाद के साथ लागू किया जा सकता है। इस मुद्दे का समाधान अज़रबैजान की धर्मनिरपेक्ष नीति और धार्मिक अधिकारों के संतुलन पर निर्भर करेगा।

📡 स्रोत: Dainik Bhaskar

💡 पृष्ठभूमि (Background)

अज़रबैजान में सरकार ने स्कूलों के लिए नया ड्रेस कोड लागू किया, जिसमें हिजाब और अन्य धार्मिक परिधान पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। यह कदम 96% मुस्लिम आबादी वाले देश में धर्मनिरपेक्षता की नीति को आगे बढ़ाने के लिए उठाया गया है। खबर का महत्व इस तथ्य में है कि इस बदलाव से छात्राओं और शिक्षिकाओं को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है, जिससे सामाजिक असमानता और धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं। आम जनता पर इसका असर शिक्षा प्रणाली में असमानता बढ़ाने के साथ-साथ धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गहरा

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan जनता का संदेश के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।