बड़ी बहन के बाल पकड़कर बचा 6 साल का कार्तिक:वैशाली नाव हादसा-एक परिवार के 7, दूसरे के 5 बच्चों की मौत;पीड़िता ने कहा-लगा नहीं था बच पाऊंगी
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →"हमारे परिवार में 20 लोग थे। अब 13 ही बचे हैं। बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा कर रहे थे। हर माता-पिता की उम्मीद होती है कि बच्चे पढ़-लिखकर परिवार का सहारा बनेंगे, लेकिन अब वे बच्चे ही नहीं रहे। " ये कहना है रामनरेश राय का, जिनके सपने बच्चों की मौत के बाद गंगा की लहरों में डूब गए। वैशाली के राघोपुर दियारा में मंगलवार रात गंगा नदी में नाव पलटने से 13 बच्चों की मौत हो गई।
किसी परिवार ने अपनी दो बेटियां खो दीं, तो किसी घर से तीन बच्चे एक साथ नहीं लौटे। हादसे में छह साल के कार्तिक कुमार की जान अपनी बड़ी बहन के बाल पकड़ने से बची। वहीं, 11वीं में पढ़ने वाली निशा कुमारी तीन बार पानी पीने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और तैरकर बाहर निकल आई। पहले घटना से जुड़ी तस्वीरें देखिए… कैसे हुई 13 बच्चों की मौत?
मंगलवार रात 8:30 बजे राघोपुर दियारा क्षेत्र में करीब 30 लोग एक छोटी नाव पर सवार होकर गंगा पार तेरहवीं के भोज में शामिल होने जा रहे थे। नाव किनारे से कुछ दूर आगे बढ़ी ही थी कि उसमें पानी भरने लगा। देखते ही देखते नाव पलट गई और उस पर सवार लोग नदी में गिरने लगे। चारों तरफ चीख-पुकार मच गई।
किसी को संभलने तक का मौका नहीं मिला। बच्चे पानी में डूबने लगे। उनकी आवाज सुनकर किनारे पर मौजूद ग्रामीण नदी की ओर दौड़े। कुछ लोग लकड़ी और दूसरी चीजें तलाशने लगे, ताकि उनके सहारे पानी में फंसे लोगों को बाहर निकाला जा सके। जब कुछ नहीं मिला, तो कई ग्रामीण अपनी जान की परवाह किए बिना नदी में कूद गए।
अंधेरे में पानी के भीतर लोगों को तलाशना बेहद मुश्किल था। इसके बावजूद ग्रामीणों ने अपने स्तर पर बचाव की कोशिश की। किसी ने डूब रहे लोगों को पकड़कर बाहर निकालने का प्रयास किया, तो किसी ने पानी में लकड़ी के सहारे शवों को तलाशा। इस हादसे में 13 बच्चों की मौत की सूचना सामने आई। मृतकों की उम्र 4 से 18 साल के बीच बताई गई।
इनमें एक परिवार के सात और दूसरे परिवार के पांच बच्चों के नाम सामने आए। अन्य घरों के बच्चे भी हादसे का शिकार हुए। हादसे के बाद गांव में मातम पसरा है। जिन घरों में दशहरा की तैयारी होनी थी, वहां अब अपनों को खोने का दुख है। कैसे हुआ हादसा?
नाव की खराब हालत को लेकर पहले क्या शिकायत की गई थी? बच्चों को खोने के बाद परिवार वालों ने क्या बताया?
इन सवालों के जवाब जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर राघोपुर दियारा पहुंची। वहां हर तरफ दुख और गुस्सा दिखाई दिया। कोई अपने बच्चों को याद कर रो रहा था, तो कोई हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग कर रहा था। अंतिम संस्कार के दौरान फूट-फूटकर रोए माता-पिता, देखिए तस्वीरें… अब सिलसिलेवार तरीके से पढ़िए पूरी खबर… ‘मेरी दो बेटियां चली गईं, चार बच्चे ही बचे हैं’ सुरेश राय ने बताया, “मेरे कुल छह बच्चे थे।
मेरी दो बेटियां अलीशा कुमारी (18) और सिंकी कुमारी (16) इस हादसे में चली गईं। अब मेरे चार बच्चे बचे हैं, जिनमें दो बेटे और दो बेटियां हैं। मैं फर्नीचर का कारोबार करता हूं। मेहनत करके अपने बच्चों को पाल रहा था। सोचा था कि वे पढ़-लिखकर आगे बढ़ेंगे, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि भोज में जाने के बाद वे घर वापस नहीं लौटेंगे।
“इस हादसे में हमारे परिवार के सात बच्चों की मौत हुई है। पीयूष कुमार (10), मीरा कुमारी (12) और बंटी कुमार (7), रामनरेश राय के बच्चे थे। आर्यन कुमार (10), अखिलेश राय का बेटा था, जबकि सोनी कुमारी (15), राम प्रवेश राय की बेटी थी। सुरेश, रामनरेश, राम प्रवेश और अखिलेश हम चारों भाई हैं। एक ही परिवार के इतने बच्चों की मौत से हमारा पूरा परिवार टूट गया है।
” नाव की मरम्मत होती तो नहीं होता हादसा सुरेश राय ने नाव की हालत को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “करीब तीन साल पहले ही हमने प्रशासन से नाव की खराब हालत की शिकायत की थी। हर बार आश्वासन दिया जाता था कि नाव की मरम्मत करा दी जाएगी या उसे बदल दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। न नाव बदली गई और न ही उसकी मरम्मत कराई गई।
“नाव के रखरखाव के नाम पर हर साल पैसे पास होने की बात कही जाती थी, लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। हमारी शिकायत पर समय रहते ध्यान दिया गया होता, तो शायद यह हादसा नहीं होता। “नाव पर पांच से दस लोगों के बैठने की क्षमता थी, लेकिन उस पर करीब 30 लोग सवार थे। नाव किनारे से लगभग 200 फीट दूर पहुंची थी, तभी उसमें पानी भरने लगा और वह पलट गई।
सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि किसी को संभलने का मौका ही नहीं मिला। ” ‘परिवार में 20 लोग थे, अब 13 ही बचे हैं’ रामनरेश राय ने कहा, “हमारे परिवार में करीब 20 लोग थे। अब 13 ही बचे हैं। बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा कर रहे थे। हर माता-पिता की उम्मीद होती है कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर कुछ बनेंगे और आगे चलकर परिवार का सहारा बनेंगे।
हम भी यही सोचते थे। बच्चों की पढ़ाई और भविष्य के लिए लोग कर्ज तक लेते हैं, लेकिन अब वे बच्चे ही नहीं रहे। “हमारे बच्चे हमसे छिपकर भोज खाने चले गए थे। अगर हमें पता होता कि वे नाव पर जा रहे हैं, तो हम उन्हें जाने ही नहीं देते। हमें क्या मालूम था कि वे घर से निकलेंगे और फिर कभी लौटकर नहीं आएंगे।
अब तो ऐसा लगता है कि मेरा पूरा परिवार ही उजड़ गया। “नदी पार करने के लिए नाव के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। जब पानी कम होता है, तो लोग पैदल नदी पार कर लेते हैं। लेकिन पानी बढ़ने पर नाव ही सहारा होती है। उस समय बच्चों को भी उसी से जाना पड़ा। ” दूसरे परिवार के तीन बच्चे भी नहीं लौटे हादसे में राजकिशोर राय की तीन बेटियों अंकिता कुमारी (14), अमृता कुमारी (4) और सुनीता कुमारी (6) की मौत हो गई।
इसके अलावा सतेंद्र राय की बेटी निशु कुमारी (15) और मुकेश कुमार के बेटे नमन कुमार (9) ने भी जान गंवा दी। चार साल की अमृता अभी इतनी छोटी थी कि उसे हर काम में परिवार के सहारे की जरूरत थी। अंकिता और निशु किशोरावस्था में थीं। उनके परिवारों ने भी उनकी पढ़ाई और भविष्य को लेकर कई सपने देखे होंगे।
अब इन घरों में बच्चों की किताबें, कपड़े और रोजमर्रा की चीजें उनकी याद दिलाएंगी। परिवारों के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल है कि जिन बच्चों को उन्होंने कुछ घंटे पहले तक अपने सामने देखा था, वे अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। ‘तीन बार पानी पीया, फिर भी हिम्मत नहीं हारी’ हादसे में बचकर निकली 11वीं की छात्रा निशा कुमारी ने बताया, “मैं उस समय नाव पर ही थी।
पहले मैं जाने के लिए तैयार नहीं थी, लेकिन घर में छोटे-छोटे बच्चे अकेले नाव पर जा रहे थे। इसी वजह से मां ने कहा कि तुम भी उनके साथ चली जाओ और उन्हें भोज वाली जगह के पास छोड़ देना। “मैंने पहले बहुत मना किया, लेकिन परिवार के लोगों के कहने पर चली गई। नाव थोड़ी दूर पहुंची थी कि वह डगमगाने लगी और फिर पानी में पलट गई।
मैं भी नदी में गिर गई। पानी में डूबते समय मैंने तीन बार पानी पी लिया था, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। किसी तरह खुद को संभाला और तैरकर बाहर निकल आई। मुझे लगा नहीं था कि मैं बच पाऊंगी। “मेरे पीछे मेरा छोटा भाई कार्तिक भी पानी में डूब रहा था। उसने मेरे बाल पकड़ लिए। इसके बाद किसी तरह वह भी पानी से बाहर निकल पाया।
” छह साल के कार्तिक के लिए उस समय खुद को बचाना बेहद मुश्किल था। नाव पलटते ही चारों तरफ पानी और चीख-पुकार मच गई थी। ऐसे में उसकी बहन का सहारा ही उसे बाहर निकलने में मददगार बना। निशा ने बताया कि नाव पर सवार लोगों को संभलने का मौका नहीं मिला। हर कोई अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहा था। कुछ लोग दूसरों को पकड़कर बाहर निकालने में भी जुटे थे।
‘मेरी बहन पढ़ने में होनहार थी, उसे पटना भेजना चाहता था’ गोलू कुमार ने अपनी बहन (पिंकी) को याद करते हुए कहा, “मैंने अपनी जवान बहन को खो दिया। वह नौवीं क्लास में पढ़ती थी और पढ़ने में बहुत होनहार थी। मैंने सोचा था कि एक साल बाद जब वह दसवीं पास कर लेगी, तो उसे पढ़ने के लिए पटना भेजूंगा।
चाहता था कि वह अच्छी पढ़ाई करे, अपने पैरों पर खड़ी हो और जिंदगी में कुछ बने। “हमने कभी नहीं सोचा था कि इस तरह की घटना हो जाएगी। मेरी आंखों के सामने मेरी बहन, भतीजे और भतीजी की मौत हो गई। मैं चाहकर भी उनके लिए कुछ नहीं कर पाया। यह बात मुझे जिंदगी भर याद रहेगी। “जब मेरी बहन को नदी से बाहर निकाला गया, तब उसकी सांसें चल रही थीं।
हम उसे तुरंत अस्पताल लेकर पहुंचे। एंबुलेंस में ऑक्सीजन नहीं थी। अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टर ने एक इंजेक्शन लिखकर दिया, जिसे बाहर से लाने के लिए कहा गया। अस्पताल में वह इंजेक्शन भी उपलब्ध नहीं था। “अगर वहां सारी सुविधाएं होतीं और समय पर इलाज मिल जाता, तो शायद आज मेरी बहन जिंदा होती।
वह हमारे बीच बैठी होती। हम उसके भविष्य के बारे में बात कर रहे होते। अब तो सब कुछ खत्म हो गया। ” ‘लकड़ी के सहारे पानी में बच्चों को तलाशते रहे’ सुरेश राय ने बताया, “हादसे की जानकारी मिलते ही मैं मौके पर पहुंचा। मेरी आंखों के सामने 15 से ज्यादा बच्चे पानी में डूब रहे थे। उन्हें छटपटाते देखकर समझ नहीं आ रहा था कि किसे बचाएं और किसकी मदद करें।
“हमने पहले लकड़ी और दूसरी चीजें तलाशनी शुरू कीं, ताकि उनके सहारे लोगों को बाहर निकाला जा सके। जब कुछ नहीं मिला, तो मैं चार-पांच अन्य लोगों के साथ नदी में कूद गया। हम अपनी तरफ से लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे थे। “बाद में ग्रामीणों ने छोटी-छोटी लकड़ियों के सहारे पानी में लोगों को तलाशना शुरू किया।
रात का अंधेरा था, इसलिए कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। हम लकड़ी के सहारे शवों का पता लगाने और उन्हें बाहर निकालने की कोशिश करते रहे। “करीब तीन साल पहले नाव की खराब हालत को लेकर प्रशासन से शिकायत की थी। हर बार कहा गया कि नाव ठीक करा दी जाएगी। लेकिन आज हमारे परिवार के सात बच्चों की मौत हो गई।
अब हम क्या मांग सकते हैं?
हमारे बच्चे ही नहीं रहे। बस यही चाहते हैं कि इस हादसे की जांच हो और जिनकी जिम्मेदारी थी, उनसे जवाब लिया जाए। ” दशहरा से पहले गांव में मातम ग्रामीणों ने बताया कि दशहरा का त्योहार नजदीक था। घरों में बच्चों के साथ त्योहार मनाने की तैयारी होनी थी। परिवारों को उम्मीद थी कि बच्चे भोज में शामिल होकर लौटेंगे और फिर घर में पहले जैसी रौनक होगी, लेकिन नाव हादसे ने सब कुछ बदल दिया।
अब जिन घरों में बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां सन्नाटा है। माता-पिता के सामने बच्चों के बिना जिंदगी आगे बढ़ाने की चुनौती है। किसी ने बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसे बचाए थे, तो किसी ने उन्हें बेहतर भविष्य देने के लिए कर्ज लिया था। सभी की उम्मीद थी कि बच्चे बड़े होकर परिवार का सहारा बनेंगे।
📡 स्रोत: NewsData.io