बाड़मेर की रामलीला: 50 साल से निःस्वार्थ भक्ति, 36 साल से दशरथ बने झामन शर्मा
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बाड़मेर में करीब पांच दशक से रामलीला का मंचन आस्था और सेवा की अनूठी मिसाल बना हुआ है, जहां 80 से 100 कलाकार बिना मानदेय के अभिनय करते हैं। राजा दशरथ का किरदार निभा रहे झामन शर्मा पिछले 36 वर्षों से अपने भावुक अभिनय से दर्शकों को भावविभोर कर रहे हैं।
बाड़मेर, 15 अक्टूबर। आज के दौर में जहां हर काम के बदले पारिश्रमिक की अपेक्षा की जाती है, वहीं बाड़मेर की ऐतिहासिक रामलीला आस्था, समर्पण और निःस्वार्थ सेवा की अनूठी मिसाल पेश कर रही है। जिला मुख्यालय पर दशकों से हो रहा रामलीला का मंचन आमजन के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां करीब 80 से 100 कलाकार बिना किसी मानदेय के प्रभु श्रीराम के जीवन प्रसंगों को मंच पर जीवंत करते हैं।
इस रामलीला की सबसे खास बात कलाकारों का सेवा भाव है। व्यापारी, शिक्षक, कर्मचारी और युवा दिनभर अपने कामकाज और जिम्मेदारियों को निभाते हैं, जबकि रात होते ही वे रामलीला के मंच पर विभिन्न पात्रों के रूप में नजर आते हैं। पात्रों की वेशभूषा तैयार करने से लेकर मेकअप और संवादों के अभ्यास तक, हर काम श्रद्धा और समर्पण के साथ किया जाता है।
36 वर्षों से राजा दशरथ का किरदार निभा रहे झामन शर्मा
बाड़मेर की रामलीला में राजा दशरथ का किरदार निभाने वाले झामन शर्मा विशेष पहचान रखते हैं। इंश्योरेंस इंडिया कंपनी से सेवानिवृत्त झामन शर्मा पिछले 36 वर्षों से लगातार चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ की भूमिका निभा रहे हैं। उनके अभिनय में पुत्र वियोग की वेदना और भावनाओं की गहराई दर्शकों को भावुक कर देती है।
झामन शर्मा बताते हैं कि वर्ष 1978 में मथुरा से आई प्रसिद्ध रामलीला मंडली ने जब बाड़मेर में प्रभु श्रीराम के जीवन प्रसंगों का मंचन किया, तो वहां का भक्तिमय वातावरण उनके मन को छू गया। कलाकारों के हाव-भाव और भावुक संवादों ने उन्हें इस परंपरा से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।
1979 में हुई स्थानीय रामलीला की शुरुआत
मथुरा की रामलीला मंडली के मंचन से प्रेरित होकर अगले ही वर्ष, 1979 में बाड़मेर में स्थानीय स्तर पर रामलीला मंचन की शुरुआत हुई। संस्था के प्रथम अध्यक्ष लेहर चंद जैन के मार्गदर्शन में इस धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा की नींव रखी गई। वर्तमान में प्रदीप कुमार जोशी संस्था के अध्यक्ष हैं।
तब से रामलीला के माध्यम से कलाकार प्रभु श्रीराम के आदर्शों, मर्यादा और जीवन मूल्यों को लोगों तक पहुंचा रहे हैं। वर्षों से जारी यह आयोजन नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी बना हुआ है।
प्रभु की सेवा ही सबसे बड़ा प्रतिफल
झामन शर्मा का मानना है कि प्रभु श्रीराम की गाथा का गुणगान करने के लिए पारिश्रमिक की जरूरत नहीं है। उनके अनुसार, भगवान की सेवा करने का अवसर मिलना ही सबसे बड़ा प्रतिफल है।
बाड़मेर की यह रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग, सांस्कृतिक विरासत और निःस्वार्थ सेवा की जीवंत मिसाल है। कलाकारों का समर्पण बताता है कि जब आस्था और अभिनय का संगम होता है, तो रंगमंच मनोरंजन से आगे बढ़कर आराधना का रूप ले लेता है।
बाइट - प्रदीप जोशी, अध्यक्ष, रामलीला कमेटी
बाइट - झामन जोशी,कलाकार, राजा दशरथ
💡 पृष्ठभूमि (Background)
बाड़मेर का रामलीला एक धार्मिक परम्परा है, जहाँ 80 से 100 कलाकार बिना मानदेय के भगवान राम की कथा प्रस्तुत करते हैं। यह 50 वर्ष से चल रही है और झामन शर्मा 36 वर्ष से राजा दशरथ का किरदार निभा रहे हैं। यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आज के व्यावसायिक समाज में निःस्वार्थ भक्ति और सेवा का उदाहरण देती है। ऐसी परम्परा से लोगों में आस्था, समर्पण और समाजिक एकजुटता की भावना जागृत होती है, जिससे ग्रामीण और शहरी दोनों वर्गों में सांस्कृतिक पहचान और मानवीय मूल्यों की पुनः पुष्टि होती है।