बांस शिल्प से साकार कर रहे पर्यावरण अनुकूल दीपावली का सपना
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मूल रूप से नरसिंहपुर जिले के रहने वाले धर्मेंद्र रोहर पिछले 20 वर्षों से भोपाल में बांस शिल्प के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। पारिवारिक शिल्प परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वे बांस जैसी प्राकृतिक सामग्री से उपयोगी और आकर्षक कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं। उनकी बनाई गई तोरण, लटकन, लैंप और अन्य सजावटी वस्तुएं त्योहारों पर घरों को विशेष रूप देने का एक सुंदर विकल्प बन रही हैं।
धर्मेंद्र रोहर की विशेषता यह है कि वे पारंपरिक बांस शिल्प को आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़कर नई पहचान दे रहे हैं। उनकी कलाकृतियों में उपयोगिता, सुंदरता और प्राकृतिक सामग्री का बेहतर समन्वय देखने को मिलता है। दीपावली के अवसर पर दरवाजों पर लगाने वाली आकर्षक तोरण और घरों में सजावट के लिए तैयार की गई वस्तुएं उनकी रचनात्मक सोच और मेहनत का उदाहरण हैं।
आज जब पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के प्रति लोगों की रुचि बढ़ रही है, तब धर्मेंद्र रोहर का बांस शिल्प एक सार्थक पहल के रूप में सामने आ रहा है। वे प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग करने के साथ बची हुई सामग्री का पुनः इस्तेमाल कर सजावटी वस्तुएं तैयार करने पर भी जोर देते हैं। इससे सामग्री का बेहतर उपयोग होता है और पर्यावरण अनुकूल सजावट को प्रोत्साहन मिलता है।
दीपावली पर रोशनी और सजावट के बीच बांस से बनी ये कलाकृतियां पारंपरिक शिल्प की खूबसूरती को सामने लाती हैं। उनका प्रयास है कि लोग सजावट के लिए प्राकृतिक सामग्री से बने उत्पादों को अपनाएं और स्थानीय शिल्पकारों की कला को प्रोत्साहित करें।
धर्मेंद्र रोहर अब तक बांस शिल्प की 105 प्रकार की कलाकृतियां अलग-अलग डिजाइनों में तैयार कर चुके हैं। वे विभिन्न त्योहारों और अवसरों के अनुरूप सजावटी वस्तुओं के नए स्वरूप विकसित करते हैं। उनकी रचनात्मकता साधारण बांस और अन्य उपलब्ध सामग्रियों को आकर्षक कलाकृतियों में बदलने की क्षमता को दर्शाती है।
धर्मेंद्र का मानना है कि रचनात्मक सोच, निरंतर अभ्यास और मेहनत से साधारण सामग्री को भी सुंदर एवं उपयोगी रूप दिया जा सकता है। उनका कार्य पारंपरिक हस्तशिल्प को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और स्थानीय कला को प्रासंगिक बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
बांस शिल्प को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य से धर्मेंद्र रोहर अब तक 95 कार्यशालाएं आयोजित कर चुके हैं। इन कार्यशालाओं में स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों के साथ दिव्यांग बच्चे और महिलाएं भी शामिल हुए हैं। कार्यशालाओं के माध्यम से वे प्रतिभागियों को बांस शिल्प की बारीकियों, रचनात्मक उपयोग और इससे आकर्षक वस्तुएं तैयार करने की प्रक्रिया से परिचित कराते हैं।
उनका यह प्रयास केवल कलाकृतियां बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक हुनर को साझा करने, लोगों में रचनात्मकता विकसित करने और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है।
‘बम्बू मैन भोपाल’ के रूप में पहचान बना रहे धर्मेंद्र रोहर की यात्रा बताती है कि पारंपरिक कला को आधुनिक आवश्यकताओं से जोड़कर नई संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं। बांस शिल्प के प्रति उनका समर्पण स्थानीय हस्तशिल्प, पर्यावरण अनुकूल उत्पादों और कौशल विकास को प्रोत्साहित करने का प्रेरक उदाहरण है।
दीपावली के इस अवसर पर धर्मेंद्र रोहर की प्राकृतिक सामग्रियों से बनी कलाकृतियां यह संदेश देती हैं कि त्योहारों की सजावट को सुंदर बनाने के साथ पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी निभाई जा सकती है। उनका हुनर पारंपरिक विरासत को संजोने और उसे आधुनिक जीवनशैली में स्थान दिलाने की प्रेरणा देता है।
💡 पृष्ठभूमि (Background)
यह खबर बांस शिल्प से बनी पर्यावरण अनुकूल दीपावली सजावट के बारे में है। धर्मेंद्र रोहर, नरसिंहपुर के, 20 वर्षों से भोपाल में बांस से कलाकृतियाँ बनाते हैं। यह विषय परंपरा और पर्यावरण संरक्षण को जोड़ता है। यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि प्राकृतिक सामग्री से त्योहारों को सुंदर और टिकाऊ बनाया जा सकता है, जिससे प्लास्टिक व कांच के उपयोग में कमी आती है। आम जनता पर इसका असर सकारात्मक है: लोग किफ़ायती, सुंदर और पर्यावरण‑अनुकूल विकल्प चुनकर अपनी परंपराओं को नया रूप दे सकते हैं, साथ ही स्थानी