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भारतीय शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी संकट: सरकारी स्कूलों की स्थिति और गुणवत्ता सुधार की अनिवार्य ज़रूरत

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 25 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश

किसी भी राष्ट्र की प्रगति, संप्रभुता और आर्थिक समृद्धि की नींव उसकी शिक्षा व्यवस्था पर टिकी होती है। भारत जैसे विशाल और युवा आबादी वाले देश में शिक्षा केवल एक बुनियादी अधिकार नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का सबसे सशक्त माध्यम है। स्वतंत्रता के बाद से अब तक हमने साक्षरता दर और स्कूलों में बच्चों के नामांकन के स्तर पर सराहनीय प्रगति की है।

लगभग हर गाँव तक प्राथमिक विद्यालय पहुँच चुके हैं, लेकिन केवल संख्यात्मक विस्तार को वास्तविक सफलता नहीं माना जा सकता। आज हमारा मुख्य संकट शिक्षा तक पहुँच से बढ़कर उसकी गुणवत्ता और प्रासंगिकता का है। क्लासरूम में बच्चों की मौजूदगी तो बढ़ी है, परंतु बुनियादी भाषाई समझ और गणितीय दक्षता के स्तर पर गंभीर कमियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं।

ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा की वास्तविक चुनौतियों को पहचानकर ठोस संरचनात्मक सुधार किए जाएँ।

सरकारी स्कूलों की ज़मीनी स्थिति और गुणवत्ता का संकट

देश के अधिकांश ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में सरकारी स्कूल ही जनसामान्य के बच्चों के लिए शिक्षा का एकमात्र साधन हैं। विडंबना यह है कि इन प्राथमिक और माध्यमिक संस्थानों की भौतिक एवं शैक्षणिक स्थिति आज भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है। देश के हजारों प्राथमिक विद्यालयों में आज भी बुनियादी ढाँचे का भारी अभाव देखा जा सकता है।

कहीं सुरक्षित पेयजल और कार्यात्मक शौचालयों की कमी है, तो कहीं पर्याप्त कक्षाओं और बिजली की व्यवस्था नहीं है। सबसे गंभीर स्थिति शिक्षकों की कमी और एक ही शिक्षक द्वारा पूरी शाला चलाए जाने की मजबूरी है। जब स्कूल की बुनियादी जरूरतें ही अधूरी हों, तो वहाँ से उच्च कोटि के शैक्षणिक माहौल की उम्मीद करना बेमानी साबित होता है।

इसके अलावा, पढ़ाई के पारंपरिक तरीकों और रटंत प्रणाली ने बच्चों की तार्किक और विश्लेषणात्मक क्षमता को सीमित कर दिया है। विभिन्न राष्ट्रीय शैक्षणिक सर्वेक्षण इस कड़वी हकीकत को उजागर करते रहे हैं कि पाँचवीं कक्षा के कई बच्चे दूसरी कक्षा की पाठ्यपुस्तकें भी धाराप्रवाह नहीं पढ़ पाते। बुनियादी संख्यात्मक ज्ञान का स्तर भी अपेक्षित मानकों से काफी नीचे है।

जब नींव ही कमजोर रह जाती है, तो उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों का प्रदर्शन स्वतः ही प्रभावित होता है। सरकारी स्कूलों में शैक्षणिक गुणवत्ता का यह गिरता स्तर सामाजिक असमानता को और गहरा कर रहा है, जहाँ सक्षम वर्ग निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहा है और कमजोर वर्ग गुणवत्ताहीन शिक्षा के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है।

डिजिटल विभाजन और नीतिगत क्रियान्वयन की विफलताएँ

कोरोना महामारी के बाद शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी उपकरणों और ऑनलाइन माध्यमों की भूमिका तेजी से बढ़ी है। ई-लर्निंग और स्मार्ट क्लासरूम को भविष्य की शिक्षा के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। निःसंदेह तकनीक शिक्षण प्रक्रिया को रोचक और सुलभ बना सकती है, किंतु भारत के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में इसने एक नया डिजिटल विभाजन भी पैदा कर दिया है।

महानगरों और संपन्न परिवारों के बच्चे तो लैपटॉप, इंटरनेट और उन्नत डिजिटल साधनों का लाभ उठा रहे हैं, परंतु ग्रामीण भारत के करोड़ों छात्र स्मार्टफोन और निर्बाध इंटरनेट के अभाव में इस डिजिटल दौड़ में पिछड़ गए हैं। तकनीक शिक्षा को समावेशी बनाने के बजाय विषमता बढ़ाने का नया माध्यम बन रही है।

इस संकट के मूल में शिक्षकों के प्रशिक्षण और जवाबदेही से जुड़ी नीतिगत विफलताएँ भी शामिल हैं। हमारे देश में शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक प्रशासनिक कार्यों का भारी बोझ रहता है, जिससे उनका मुख्य ध्यान अध्यापन से हट जाता है। साथ ही, आधुनिक शैक्षणिक तकनीकों और बाल मनोविज्ञान को समझने के लिए शिक्षकों को दिए जाने वाले नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था बेहद ढीली है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कौशल विकास और मातृभाषा में शिक्षण पर बल दिया गया है, जो एक सकारात्मक कदम है, परंतु जब तक राज्यों के स्तर पर पर्याप्त बजट आवंटन और निगरानी तंत्र दुरुस्त नहीं होगा, तब तक नीतियाँ केवल कागजों तक सीमित रहेंगी।

भविष्य की राह: संसाधन, जवाबदेही और सुधार

भारत को अपनी युवा जनसांख्यिकी का लाभ उठाने के लिए शिक्षा सुधारों को अपनी सर्वोच्च राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। इसके लिए जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक शिक्षा पर खर्च करने की आवश्यकता है, ताकि स्कूलों में शिक्षकों के सभी रिक्त पद तुरंत भरे जा सकें और बेहतर बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकें।

डिजिटल शिक्षा को केवल एक विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि भौतिक कक्षाओं के विकल्प के रूप में। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार पंचायतों के स्तर पर सामूहिक अध्ययन केंद्रों के माध्यम से किया जा सकता है। रटने की परंपरा को छोड़कर अनुभवात्मक शिक्षण, खेल-आधारित पद्धतियों और बुनियादी साक्षरता पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

जब तक शिक्षा व्यवस्था समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े बच्चे को गुणवत्तापूर्ण ज्ञान देने में सक्षम नहीं होगी, तब तक विकसित भारत का स्वप्न अधूरा ही रहेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न: भारत में प्राथमिक शिक्षा की सबसे प्रमुख चुनौती क्या है?

उत्तर: प्राथमिक स्तर पर सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान का अभाव है। नामांकन दर अधिक होने के बावजूद बड़ी संख्या में बच्चे अपनी कक्षा के अनुरूप सामान्य पठन और गणित के सवाल हल करने में सक्षम नहीं हैं।

प्रश्न: क्या डिजिटल शिक्षा पारंपरिक क्लासरूम का स्थायी विकल्प बन सकती है?

उत्तर: डिजिटल शिक्षा एक सहायक उपकरण हो सकती है, लेकिन वह पारंपरिक क्लासरूम और शिक्षक के सीधे मार्गदर्शन का स्थान नहीं ले सकती। इसके अलावा देश में इंटरनेट और उपकरणों की असमान पहुँच के कारण इसे एकमात्र विकल्प बनाना व्यावहारिक नहीं है।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan जनता का संदेश के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।