भोपाल

भोपाल के ‘बैम्बू मैन’ बने धर्मेंद्र रोहर पारंपरिक शिल्प में नवाचार से तैयार कर रहे आकर्षक कलाकृतियां

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 23 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
भोपाल के ‘बैम्बू मैन’ बने धर्मेंद्र रोहर पारंपरिक शिल्प में नवाचार से तैयार कर रहे आकर्षक कलाकृतियां

बांस का छोटा-सा सुपड़ा, जो परंपरागत रूप से घरेलू कामकाज का हिस्सा रहा है, धर्मेंद्र रोहर के हाथों में आकर घर की दीवार सजाने वाली आकर्षक कलाकृति बन जाता है। रंग-बिरंगे धागों के पोम-पोम, भगवान गणेश की आकृति और घंटी से सजा यह सुपड़ा उनके हुनर की एक झलक है। कपड़े की बची हुई कतरनें हों या धान और बांस का बुरादा — धर्मेंद्र अपनी रचनात्मकता से इन सामग्रियों को नया रूप और उपयोग दे रहे हैं। इसी कला ने उन्हें स्थानीय स्तर पर ‘बैम्बू मैन ऑफ भोपाल’ की पहचान दिलाई है।

मूल रूप से नरसिंहपुर जिले के निवासी धर्मेंद्र रोहर करीब 20 वर्षों से भोपाल में रहकर बांस शिल्प को आगे बढ़ा रहे हैं। पारंपरिक कला के प्रति लगन और नए प्रयोग करने की सोच उनकी इस यात्रा का आधार है। उन्होंने बांस शिल्प को परंपरागत वस्तुओं तक सीमित रखने के बजाय बदलती पसंद और जरूरतों से जोड़ा है। उनकी कलाकृतियों में लोकशिल्प की आत्मीयता भी है और आधुनिक सजावट का आकर्षण भी।

साधारण सामग्री में तलाशते हैं सृजन की संभावनाएं

धर्मेंद्र की कला की खासियत सामग्री को देखने का उनका नजरिया है। बांस, धान, सूती धागे और कपड़े की बची हुई कतरनें उनके लिए नई कलाकृति तैयार करने के साधन हैं। इन सामग्रियों के आकार, रंग और बनावट को जोड़कर वे उपयोगी तथा सजावटी वस्तुएं बनाते हैं। बांस के सुपड़े से तैयार वॉल हैंगिंग इसी सोच का उदाहरण है। रोजमर्रा के उपयोग की एक पारंपरिक वस्तु को सजावट का नया स्वरूप देकर वे उसके उपयोग की संभावनाएं बढ़ा रहे हैं। उनके ऐसे प्रयोग बताते हैं कि स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक हुनर को रचनात्मक सोच का साथ मिले तो वे आज के घरों और जीवनशैली में भी अपनी जगह बना सकते हैं।

रिश्तों के त्योहार में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश

रक्षाबंधन पर धर्मेंद्र की रचनात्मकता पर्यावरण-अनुकूल राखियों के रूप में सामने आती है। इन्हें तैयार करने में वे प्राकृतिक और दोबारा उपयोग की जा सकने वाली सामग्रियों को प्राथमिकता देते हैं। इन राखियों की विशेषता यह है कि त्योहार के बाद भी इन्हें सजावटी वस्तु के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह राखी का उपयोग एक दिन तक सीमित नहीं रहता। त्योहार की स्मृति घर की सजावट का हिस्सा बन जाती है।

धर्मेंद्र का यह प्रयास लोगों को प्राकृतिक सामग्री से बने उत्पाद अपनाने और वस्तुओं के पुनः उपयोग के लिए प्रेरित करता है।

तीन फीट की गणेश प्रतिमा में दिखा हुनर और धैर्य

छोटी सजावटी वस्तुओं के साथ धर्मेंद्र ने बड़ी कलाकृतियों में भी अपने कौशल का परिचय दिया है। बांस के बुरादे और धान जैसी सामग्रियों का इस्तेमाल कर उन्होंने भगवान गणेश की लगभग तीन फीट ऊंची प्रतिमा तैयार की है। यह कलाकृति प्राकृतिक सामग्रियों के साथ प्रयोग करने की उनकी क्षमता और शिल्प के प्रति समर्पण को दर्शाती है। उनके लिए हर नई कलाकृति पारंपरिक हुनर को नया विस्तार देने का अवसर है। सामग्री का चयन हो या उसे आकार देना, उनके काम में धैर्य, बारीकी और कुछ नया रचने की इच्छा दिखाई देती है।

हुनर को मिली पहचान, परंपरा को मिला नया विस्तार धर्मेंद्र रोहर की सफलता अपने हुनर को विशिष्ट पहचान दिलाने और पारंपरिक शिल्प को समकालीन जरूरतों से जोड़ने की कहानी है। करीब दो दशकों की उनकी साधना ने यह दिखाया है कि परंपरागत कला में नए प्रयोग उसे अधिक उपयोगी और आकर्षक बना सकते हैं। ‘बैम्बू मैन ऑफ भोपाल’ के रूप में उनकी पहचान के पीछे बांस को नए रूप में देखने और गढ़ने का निरंतर प्रयास है। उनकी कलाकृतियां घरों की सुंदरता बढ़ाने के साथ प्रकृति के अनुकूल विकल्पों की ओर भी ध्यान खींचती हैं।

धर्मेंद्र अपने काम से संदेश दे रहे हैं कि बदलाव की शुरुआत उपलब्ध संसाधनों को नई दृष्टि से देखने और अपने हुनर पर विश्वास करने से भी होती है।

M
Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan जनता का संदेश के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।