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ब्रिक्स देश डिजिटल करेंसी से कारोबार की तैयारी में:छोटे कारोबारियों को बड़ी राहत; बिना कुछ भी गिरवी रखे ब्रिक्स देशों में कारोबार कर पाएंगे

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 8 सितंबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
ब्रिक्स देश डिजिटल करेंसी से कारोबार की तैयारी में:छोटे कारोबारियों को बड़ी राहत; बिना कुछ भी गिरवी रखे ब्रिक्स देशों में कारोबार कर पाएंगे

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत डिजिटल करेंसी (सीबीडीसी) को आपस में जोड़ने के पायलट प्रोजेक्ट की तैयारी कर रहा है। चीन-रूस इसके को-पायलट होंगे। मकसद ब्रिक्स देशों में कमर्शियल पेमेंट्स में अमेरिकी डॉलर जैसी तीसरी मुद्रा पर निर्भरता कम करना है। इसमें कोई नई साझा मुद्रा जारी नहीं होगी।

सम्मेलन नई दिल्ली के भारत मंडपम में 11 से 13 सितंबर के बीच होने जा रहा है। भारत के डिजिटल रुपए, चीन के डिजिटल युआन और रूस के डिजिटल रूबल जैसी राष्ट्रीय डिजिटल मुद्राएं एक साझा क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम से जुड़ेंगी। साथ ही, भारत के यूपीआई, चीन के सीआईपीएस और रूस के एसपीएफएस जैसी मौजूदा राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों को भी जोड़ेंगे।

इससे देशों का अपनी मुद्रा और केंद्रीय बैंक पर नियंत्रण बना रहेगा। भारत को इससे क्या फायदा होगा फायदा ये है कि करेंसी कन्वर्जन, बैंकिंग चार्ज और सेटलमेंट का समय घटेगा। भारत-रूस के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार पहले से बढ़ रहा है। ब्रिक्स विस्तार के बाद इस समूह में इंडोनेशिया, ईरान और यूएई जैसे नए देश भी शामिल हो चुके हैं।

ग्लोबल इकोनॉमी में 40% हिस्सेदारी वाले इन देशों के बीच इस व्यवस्था से भारतीय आयातकों और निर्यातकों को बड़ा फायदा मिलेगा। भारत ने इस मॉडल के लिए प्रोजेक्ट एमब्रिज, प्रोजेक्ट अबेर और प्रोजेक्ट डनबार जैसे अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रयोगों से भी इनपुट लिया है। जयपुर में ‘ब्रिक्स इनवॉयस डिस्काउंटिंग मैकेनिज्म’ की स्टडी पर सहमति बनी छोटे एक्सपोर्टर्स को विदेशी ऑर्डर मिलने पर भी जमीन या संपत्ति जैसी गारंटी (कोलैटरल) की कमी से बैंक कर्ज नहीं मिलता है।

इस समस्या को हल करने के लिए ब्रिक्स देशों ने एक नया कदम उठाया है। जयपुर में हुई बैठक में ‘ब्रिक्स इनवॉयस डिस्काउंटिंग मैकेनिज्म’ के अध्ययन पर सहमति बनी है। इस योजना के तहत छोटे कारोबारियों को कर्ज उनकी संपत्ति के बजाय कैश फ्लो और कारोबार की क्षमता के आधार पर मिलेगा। उदाहरण के लिए, यदि किसी भारतीय कारोबारी ने विदेश में सामान बेचा है और भुगतान तीन महीने बाद मिलना है, तो वह बैंक के पास इनवॉयस रखकर तुरंत वर्किंग कैपिटल हासिल कर सकता है।

भारत में ‘ट्रेड्स’ (TReDS) प्लेटफॉर्म पहले से ही काम कर रहा है। इस सफल अनुभव के कारण भारत इस योजना में अहम भूमिका निभाएगा। यह नई व्यवस्था लागू होने पर भारतीय MSME के लिए विदेश व

📡 स्रोत: Dainik Bhaskar

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💡 पृष्ठभूमि (Background)

ब्रिक्स देशों के बीच डिजिटल करेंसी पायलट प्रोजेक्ट का उद्देश्य अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाना है। यह पहल भारत, चीन, रूस आदि को डिजिटल भुगतान नेटवर्क से जोड़ती है, जिससे व्यापारियों को बिना गिरवी के लेनदेन करने में सुविधा मिलेगी। यह कदम वैश्विक वित्तीय स्वतंत्रता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह नई मुद्रा जारी किए बिना मौजूदा डिजिटल रेज़र्व्स का उपयोग करेगा। आम जनता को कम शुल्क, तेज़ ट्रांज़ैक्शन और सीमित मुद्रा विनिमय जोखिम का लाभ मिलेगा, जिससे छोटे व्यापारियों की लागत घटेगी और आर्थिक समा

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