व्यापार

बूंदी के मिट्टी वाले अनार की दीपोत्सव पर धूम

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 6 नवंबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
बूंदी के मिट्टी वाले अनार की दीपोत्सव पर धूम

बूंदी में मिट्टी से तैयार होने वाले अनार दीपोत्सव पर लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। खास बात यह है कि इन अनारों को मशीनों से नहीं, बल्कि हाथों से पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है।

06 नवम्बर,बूंदी। दीपावली पर आतिशबाजी और रोशनी का अपना अलग ही आकर्षण होता है... लेकिन बदलते दौर में भी कुछ ऐसी पारंपरिक कलाएं हैं, जिनकी चमक आज भी बरकरार है। राजस्थान के बूंदी में मिट्टी से तैयार होने वाले अनार दीपोत्सव पर लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। खास बात यह है कि इन अनारों को मशीनों से नहीं, बल्कि हाथों से पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है। तीन पीढ़ियों से खलील भाई का परिवार इस अनूठी कला को सहेज रहा है। हालांकि, कारीगरों की कमी के चलते बढ़ती मांग को पूरा करना अब चुनौती बनता जा रहा है।

बूंदी के मिट्टी के अनार... दीपोत्सव पर इनकी चमक और मांग दोनों देखते ही बनती है। आधुनिक दौर में जहां बाजार में तरह-तरह की आतिशबाजी उपलब्ध है, वहीं बूंदी के पारंपरिक मिट्टी के अनार आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। बूंदी के अलावा राजस्थान के कई जिलों से इनकी मांग आती है, लेकिन सीमित कारीगरों के चलते मांग के अनुरूप उत्पादन नहीं हो पाता।

इन अनारों को तैयार करने की कला भी बेहद खास है। मिट्टी के कुल्हड़ में पारंपरिक तरीके से तैयार किया गया मिश्रण भरकर इन्हें हाथों से आकार दिया जाता है। घनराज, दया और ज्वालामुखी जैसे अलग-अलग नामों और आकारों वाले ये अनार रोशनी के लिए पसंद किए जाते हैं। इनकी खासियत है कि ये तेज रोशनी देते हैं और इनमें विस्फोट नहीं होता। यही वजह है कि दीपावली पर बच्चे, महिलाएं और युवा इन्हें पसंद करते हैं।

इस पारंपरिक हुनर को बूंदी में तीन पीढ़ियों से खलील भाई का परिवार जीवित रखे हुए है। खलील भाई, उनकी पत्नी, बेटा और दो अन्य कारीगर मिलकर इन अनारों को तैयार करते हैं। बनाने की प्रक्रिया में आज भी पारंपरिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। मिश्रण को ओखली में कूटने से लेकर उसे बारीक करने और मिट्टी के कुल्हड़ में भरने तक का काम हाथों से किया जाता है। इसके बाद कागज लगाकर अनार को अंतिम रूप दिया जाता है।

इन अनारों की कीमत भी इनके आकार और रोशनी के हिसाब से तय होती है। बाजार में 50 रुपये से लेकर 700 रुपये तक के अनार उपलब्ध हैं। दीपावली के नजदीक आते ही इनकी बिक्री और मांग बढ़ जाती है। खरीददारों का कहना है कि पारंपरिक तरीके से तैयार होने वाले बूंदी के इन अनारों की अपनी अलग पहचान और आकर्षण है।

बूंदी के मिट्टी के अनार सिर्फ दीपावली की आतिशबाजी का हिस्सा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक पारंपरिक कला की पहचान भी हैं। चिंता की बात यह है कि जिले में अब गिनती के ही लोग इस हुनर को आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसे में जरूरत है कि इस पारंपरिक कला को संरक्षण मिले और नई पीढ़ी भी इससे जुड़े, ताकि बूंदी के मिट्टी के अनारों की चमक आने वाले वर्षों में भी बरकरार रहे।

बाइट – खलील भाई, कारीगर

बाइट – इरफान, कारीगर का बेटा

बाइट – देवी लाल, खरीददार

बाइट – सुगना बाई, खरीददार

M
Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan जनता का संदेश के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।