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चोटीला धाम: असीम भक्ति और आस्था का केंद्र, जहां विराजती हैं मां चामुंडा

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 16 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
चोटीला धाम: असीम भक्ति और आस्था का केंद्र, जहां विराजती हैं मां चामुंडा

Date- 16 Oct 2026, Chamunda

वर्तमान में आसो मास की नवरात्रि का पवित्र पर्व चल रहा है। इस दौरान श्रद्धालु माताजी के धार्मिक स्थलों पर दर्शन, अनुष्ठान, पूजा और आरती के लिए उमड़ रहे हैं। सुरेंद्रनगर जिले के चोटीला में स्थित मां चामुंडा का यह पावन मंदिर विश्व प्रसिद्ध है।

मां चामुंडा को रण-चंडी (युद्ध की देवी) के रूप में भी जाना जाता है। वे मां दुर्गा का ही स्वरूप और शक्ति की देवी हैं। मंदिर में उनकी जुड़वां प्रतिकृति दिखाई देती है, क्योंकि उन्हें चंडी-चामुंडा दोनों कहा जाता है। मां चामुंडा की प्रतिमा की पहचान उनकी बड़ी-बड़ी आंखें, लाल या हरे रंग के वस्त्र और गले में फूलों के हार से होती है। उनका वाहन सिंह है।

मां चामुंडा का इतिहास

विश्व प्रसिद्ध चामुंडा माताजी का मंदिर चोटीला पर्वत के शिखर पर स्थित है। भारत में अधिकांश माताजी के मंदिर पर्वतों की चोटियों पर ही पाए जाते हैं। चोटीला पर्वत पर माताजी के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 635 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

सौराष्ट्र के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले तथा राजकोट और अहमदाबाद को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे नंबर 8-A के मध्य में चोटीला स्थित है। अहमदाबाद से इसकी दूरी लगभग 190 किलोमीटर और राजकोट से लगभग 50 किलोमीटर है। समुद्र तल से तुलना करने पर चोटीला न केवल सुरेंद्रनगर जिले की, बल्कि गुजरात की सबसे ऊंची भूमियों में से एक माना जाता है। चोटीला पर्वत की ऊंचाई लगभग 358 मीटर है।

स्थानीय ग्रंथों के अनुसार, चामुंडा माताजी का यह डुंगर हजारों वर्ष पुराना है। श्रीमद्देवी भागवत के अनुसार, प्राचीन काल में चोटीला एक घना जंगल था जहाँ कई ऋषि-मुनि तपस्या करते थे। इस भूमि को अत्यंत पवित्र माना जाता था। उस समय असुरों का भय और हिंसा काफी बढ़ गई थी, जिसके कारण ऋषियों के यज्ञ और तपस्या में बाधाएं आती थीं।

चंड और मुंड नाम के दो राक्षसों ने इस क्षेत्र में आतंक मचा रखा था। वे ऋषियों की तपस्या भंग करते थे और निर्दोष लोगों को मार डालते थे।

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ऋषियों ने इस समस्या के निवारण हेतु मां दुर्गा का आह्वान कर यज्ञ और प्रार्थना की। मां दुर्गा अपने 'चामुंडा' अवतार में प्रकट हुईं और उन्होंने चंड-मुंड का संहार करने का निर्णय लिया। मां चामुंडा ने अत्यंत उग्र एवं शक्तिशाली रूप धारण किया और चंड-मुंड के साथ भयंकर युद्ध किया। अपने त्रिशूल और अन्य दिव्य अस्त्रों से मां चामुंडा ने चंड और मुंड का विनाश कर दिया। चंड और मुंड का वध करने के कारण माताजी 'चंडी-चामुंडा' के नाम से जानी गईं।

जो भी भक्त सच्ची निष्ठा और भक्ति से मां चंडी-चामुंडा की पूजा करते हैं, वे उनके साक्षात आशीर्वाद के भागी बनते हैं। एक लोककथा के अनुसार, इस पर्वत पर भृगु ऋषि का भी आश्रम हुआ करता था।

मंदिर का इतिहास और विकास

वर्षों पहले चोटीला पर्वत पर मंदिर के स्थान पर केवल एक छोटा सा कमरा (ओरडा) हुआ करता था। उस समय पहाड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां भी नहीं थीं, फिर भी श्रद्धालु माताजी के दर्शन के लिए आते थे। लगभग 155 वर्ष पहले (विक्रम संवत 1910 से 1916 के दौरान) महंत गोसाईं गुलाब गिरि हरिगिरि बापू पर्वत पर मां चामुंडा की पूजा करते थे और मंदिर का विकास करते थे। वर्तमान में उनके वंशज परंपरा के अनुसार मां चामुंडा की सेवा-पूजा करते हैं और आने वाले यात्रियों के लिए आवश्यक सुविधाएं जुटाते हैं।

श्री चामुंडा माताजी गोहिलवाड़ के गोहिल दरबारों, जूनागढ़ क्षेत्र के सोलंकी, डोडिया, परमार आदि राजपूत कुलों, चोटीला क्षेत्र के खाचर-खुमाण आदि काठी दरबारों, परजिया सोनी, दर्जी, पांचाल, उत्तरी गुजरात के ठाकोर समाज, कच्छ के रबारी एवं अहीर समाज, दीव-सोमनाथ-वेरावल क्षेत्र के कोली एवं खारवा समाज, मोरबी क्षेत्र के सतवारा समाज तथा अन्य कई समाजों की कुलदेवी के रूप में पूजी जाती हैं।

यात्रियों के लिए सुविधाएं

चोटीला पर्वत पर चढ़ने के लिए वर्तमान में 635 सीढ़ियां हैं, जिनमें चढ़ने और उतरने के लिए अलग-अलग व्यवस्था की गई है। हर 100 सीढ़ियों के बाद कूलिंग सिस्टम से युक्त ठंडे पीने के पानी की व्यवस्था है। इसके अलावा, सीढ़ियों के ऊपर पूरे रास्ते शेड (छाया) होने के कारण गर्मी और बारिश के मौसम में भी यात्रियों को कोई कठिनाई नहीं होती।

वर्ष की तीन मुख्य नवरात्रियों (माघ, चैत्र और आश्विन) के दौरान पूरे पर्वत, तलहटी और हाईवे पर किसी धार्मिक 'मिनी कुंभ मेले' जैसा माहौल देखने को मिलता है। विशेष रूप से आश्विन नवरात्रि से लेकर दीपावली तक, वयोवृद्ध बुजुर्ग भी मां के प्रति असीम श्रद्धा के साथ आसानी से पर्वत चढ़ जाते हैं।

कई भक्त दंडवत प्रणाम करते हुए या लोटन-सेवा करते हुए 635 सीढ़ियां चढ़ जाते हैं, जिसे देखकर नास्तिकों का सिर भी श्रद्धा से झुक जाता है। पर्वत की तलहटी में चामुंडा डुंगर ट्रस्ट के भोजनालय में प्रतिदिन दोपहर को भक्तों को लापसी, दाल-चावल और सब्जी का प्रसाद प्रेमपूर्वक कराया जाता है।

विशेष परंपरा और नियम चोटीला चामुंडा माताजी के स्थान की एक विशेष परंपरा है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि रात के समय माताजी की सवारी (सिंह) मंदिर परिसर में भ्रमण करती है। इसलिए सूर्यास्त के बाद पर्वत पर रुकना सख्त मना है। शाम की आरती के बाद श्रद्धालुओं और पुजारियों सहित सभी लोग पर्वत से नीचे आ जाते हैं। रात में कोई भी ऊपर नहीं ठहर सकता। केवल नवरात्रि के दौरान ही माताजी की अनुमति से पुजारी सहित पांच व्यक्तियों को पर्वत पर रात्रि प्रवास की अनुमति होती है।

पर्वत पर मुख्य मंदिर में माताजी के दो स्वरूप बिराजमान हैं—चंडी और चामुंडा, जिन्होंने चंड और मुंड का वध किया था। वर्तमान में पर्वत के सामने पार्किंग गेट के पास मां चामुंडा का एक और भव्य मंदिर बन रहा है।

बाइट सूची

अशोक सोलंकी (श्रद्धालु) – (चश्मा पहने हुए)

नंदिता (श्रद्धालु) – (रानी कलर की साड़ी पहने हुए)

राकेशसिंह राणा (श्रद्धालु) – (चेक शर्ट पहने हुए)

विनोदभाई मकवाना (श्रद्धालु) – (सफेद शर्ट पहने हुए, साथ में उनकी पत्नी हैं)

अमृतगिरि गोस्वामी (महंत, चोटीला मंदिर ट्रस्ट) – (केसरिया रंग का कुर्ता पहने हुए, सफेद दाढ़ी)

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan जनता का संदेश के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।