CJP प्रोटेस्ट: नोटिस पर CJI नाराज, पूछा- 'मजिस्ट्रेट कैसे जारी कर सकते हैं'
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कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन के मामले में ग्रेटर नोएडा के मजिस्ट्रेट की तरफ से एक छात्र को नोटिस जारी करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है.
एक वकील ने बुधवार को सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष बताया कि यह नोटिस पुलिस के अनुरोध पर जारी हुआ था.
हालांकि, अब नोटिस को वापस ले लिया गया है, लेकिन इसका जारी होना साफ तौर पर छात्रों को डराने की कोशिश थी.
यह 1 सितंबर को आए सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ था जिसमें छात्रों पर दर्ज सभी एफआईआर में आगे की कार्रवाई रोकी गई थी.
मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण की मांग
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा. उन्हें बताने दीजिए कि ऐसा क्यों किया गया.
सीजेआई ने पूछा कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस कैसे जारी कर सकते हैं, जबकि शीर्ष अदालत पहले ही निर्देश दे चुकी है कि छात्रों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी. पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टि वी.
मोहना भी शामिल थे.
सीजेआई ने कहा, हमें हैरानी है कि मजिस्ट्रेट नोटिस कैसे जारी कर सकते हैं, जबकि हमने पहले ही किसी भी छात्र के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का आदेश दिया है.
यह बिल्कुल स्पष्ट आदेश था.
क्या मामला है? अधिकारियों ने मंगलवार को बताया कि गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (जीबीयू) के छात्र अक्षत त्रिपाठी को जंतर-मंतर पर CJP की अगुवाई में हुए प्रदर्शन में शामिल होने के मामले में ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी किया था.
नोटिस में शांति बनाए रखने के लिए छात्र से पांच लाख रुपये का निजी मुचलका भरने को कहा गया था. बाद में यह आदेश वापस ले लिया गया.
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने एक सितंबर को स्पेशल पावर वाले अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए सभी एफआईआर पर रोक
📡 स्रोत: ABP Live
💡 पृष्ठभूमि (Background)
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन के दौरान ग्रेटर नोएडा के मजिस्ट्रेट ने एक छात्र को नोटिस जारी किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट के CJI सूर्यकांत ने तीव्र आलोचना की। यह घटना न्यायपालिका और पुलिस के बीच अधिकार संतुलन पर सवाल उठाती है। खबर का महत्व इस बात में है कि यह दर्शाती है कि न्यायिक निगरानी के बिना भी पुलिस के अनुरोध पर मजिस्ट्रेट तुरंत कार्य कर सकते हैं, जिससे छात्र आंदोलन पर दमन का डर बढ़ता है। आम जनता पर इसका असर यह हो सकता है कि छात्र और नागरिक अपनी आवाज़ उठाने में सतर्क हो जाएँ, जबकि