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दीपोत्सव की तैयारी में जुटा कुम्हार समाज

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 28 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
दीपोत्सव की तैयारी में जुटा कुम्हार समाज

बूंदी के ठीकरदा स्थित पॉटरी विलेज में दीपावली को लेकर कुम्हार समाज के 25 से 30 परिवार दिन-रात मिट्टी के दीये, बड़ी मटकियां, कलश और सजावटी बर्तन बनाने में जुटे हैं। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा के साथ परिवारों को त्योहार पर अच्छी आमदनी की उम्मीद है।

28 अक्टूबर,बूंदी। दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही बाजार रोशनी से जगमगाने लगे हैं। कहीं रंग-बिरंगी लाइटों की चमक है, तो कहीं आकर्षक सजावटी सामान की दुकानें सजी हुई हैं। लेकिन इस चकाचौंध से दूर बूंदी के ठीकरदा स्थित पॉटरी विलेज में मिट्टी को आकार देकर दीपोत्सव की खुशियां संवारने का काम लगातार जारी है। यहां कुम्हार समाज के परिवार अपने हाथों से दीये, बड़ी मटकियां, कलश और अन्य मिट्टी के बर्तन तैयार करने में जुटे हैं। उनके हाथ मिट्टी से सने हैं, लेकिन चेहरों पर त्योहार के सीजन में अच्छी आमदनी होने की उम्मीद साफ नजर आती है।

दीपावली केवल रोशनी का पर्व नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं को जीवित रखने का अवसर भी है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ठीकरदा के पॉटरी विलेज में रहने वाले करीब 25 से 30 परिवार इन दिनों दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। जैसे-जैसे दीपोत्सव नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे मिट्टी के दीयों और पारंपरिक बर्तनों की मांग को पूरा करने के लिए कुम्हार परिवारों की व्यस्तता बढ़ती जा रही है।

सुबह से शाम तक मिट्टी के साथ मेहनत पॉटरी विलेज में सुबह जल्दी ही काम शुरू हो जाता है। परिवार का हर सदस्य अपनी जिम्मेदारी निभाता नजर आता है। कोई मिट्टी तैयार करता है, तो कोई चाक पर बैठकर दीये और बर्तन बनाता है। तैयार बर्तनों को आकर्षक रूप देने के लिए महिलाएं उन पर मांडणे बनाती हैं। इस तरह मिट्टी के साधारण बर्तनों को सजाकर त्योहार के लिए खास बनाया जाता है।

बुजुर्गों से लेकर महिलाओं और युवा कारीगरों तक, सभी इस काम में हाथ बंटाते हैं। कई घंटों की मेहनत के बाद मिट्टी आकार लेती है और उससे तैयार होता है वह दीया, जो दीपावली की रात घर-आंगन को रोशन करता है। परिवारों के लिए यह सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला और विरासत को सहेजने का माध्यम भी है।

सालभर दीपावली का रहता है इंतजार बुजुर्ग कारीगर हीरालाल प्रजापत बताते हैं कि कुम्हार समाज के परिवार पूरे साल दीपावली के सीजन का इंतजार करते हैं। बारिश का दौर समाप्त होते ही मिट्टी के बर्तन बनाने की तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं। दीपोत्सव के दौरान दीयों के साथ मटकियां, कलश, करवा चौथ के करवे और सजावटी गुलदस्ते भी तैयार किए जाते हैं।

हीरालाल प्रजापत के अनुसार, बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पूरा परिवार मिलकर काम करता है। मिट्टी तैयार करने से लेकर चाक पर बर्तन बनाने और उन पर मांडणे सजाने तक हर काम में परिवार के सदस्य जुटे रहते हैं। त्योहार के दिनों में काम का दबाव बढ़ जाता है, लेकिन इसी सीजन से उन्हें बेहतर आमदनी की उम्मीद भी रहती है।

बड़ी मटकियों, दीयों और कलश की मांग दीपावली के अवसर पर घरों को सजाने और पूजा-पाठ के लिए मिट्टी से बने पारंपरिक उत्पादों का विशेष महत्व रहता है। दीयों के साथ बड़ी मटकियां और कलश भी लोगों की पसंद का हिस्सा हैं। यही वजह है कि ठीकरदा के कुम्हार परिवार इन दिनों अलग-अलग आकार और डिजाइन के मिट्टी के उत्पाद तैयार करने में जुटे हैं। कारीगरों की कोशिश रहती है कि पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखते हुए बर्तनों को आकर्षक बनाया जाए, ताकि लोग इन्हें अपने घरों और पूजा स्थलों की सजावट में इस्तेमाल कर सकें। मिट्टी के हर उत्पाद के पीछे कारीगरों का हुनर, समय और मेहनत जुड़ी होती है।

लोकल फॉर वोकल को मिल रहा बढ़ावा आधुनिक दौर में बाजार में बिजली से चलने वाली सजावटी लाइटों और तरह-तरह के कृत्रिम सजावटी सामान की भरमार है। इसके बावजूद पारंपरिक मिट्टी के दीयों का अपना अलग महत्व बना हुआ है। कुम्हार समाज के ये परिवार अपनी कला के जरिए स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा दे रहे हैं और पारंपरिक शिल्प को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। मिट्टी के दीये खरीदना स्थानीय कारीगरों की मेहनत को सम्मान देने और उनके परिवारों की आजीविका को सहारा देने का एक माध्यम भी है। त्योहार पर स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देने से पारंपरिक कला से जुड़े परिवारों को प्रोत्साहन मिल सकता है।

एक दीया, एक परिवार की उम्मीद ठीकरदा के पॉटरी विलेज में बन रहा हर दीया अपने साथ संघर्ष और उम्मीद की कहानी समेटे हुए है। कारीगरों के हाथों से तैयार होकर जब यह दीया किसी घर की चौखट या पूजा स्थल पर पहुंचेगा, तो उसकी रोशनी केवल घर को ही नहीं, बल्कि उसे बनाने वाले परिवार की उम्मीदों को भी रोशन करेगी। इस दीपावली जब आप अपने घर को रंग-बिरंगी लाइटों से सजाएं, तो मिट्टी के दीयों के लिए भी एक जगह जरूर रखें। क्योंकि उस छोटे से दीये में केवल तेल और बाती नहीं, बल्कि कुम्हार परिवारों की मेहनत, हुनर, परंपरा और बेहतर भविष्य की उम्मीद भी रोशन होती है।

बाइटस - हीरालाल प्रजापत, कुम्हार कारीगर सुगना बाई, महिला कारीगर

हनुमान प्रजापत, कारीगर भगवान प्रजापत, कारीगर

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan जनता का संदेश के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।