डोनल्ड ट्रंप के 5000 डॉलर और वोटर ID वाले प्रस्ताव से बदल रहा अमेरिका का चुनावी पैटर्न, क्या है भारत की DBT योजना से इसका कनेक्शन
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दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र होने का दावा करने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका की राजनीतिक और चुनावी संस्कृति में इन दिनों एक बहुत बड़ा वैचारिक और व्यावहारिक बदलाव देखने को मिल रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने जिस प्रकार से अमेरिकी चुनाव प्रणाली को नया रूप देने की शुरुआत की है, उसने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
हाल ही में डलास में आयोजित रिपब्लिकन मिडटर्म कन्वेंशन के दौरान ट्रंप ने अमेरिकी मतदाताओं के सामने एक ऐसा आकर्षक और सीधा प्रस्ताव रखा, जिसने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। ट्रंप ने देश की जनता से खुलकर यह वादा किया है कि यदि आगामी चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापस लाया जाता है, तो देश के प्रत्येक वयस्क अमेरिकी नागरिक को सरकार की तरफ से 5,000 डॉलर का भारी-भरकम डिविडेंड या नकद लाभ प्रदान किया जाएगा।
इस प्रकार की चुनावी घोषणाएं और नकद प्रोत्साहन देने की संस्कृति भले ही पश्चिमी देशों के लिए थोड़ी नई और अनोखी लग सकती है, लेकिन भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देशों के राजनीतिक इतिहास और चुनावी परिदृश्य से परिचित लोगों के लिए यह शैली अत्यंत जानी-पहचानी और पारंपरिक प्रतीत होती है। भारत की डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजना से प्रेरित लगती है ट्रंप की यह अनोखी रणनीति राजनीतिक जानकारों का यह मानना है कि डोनल्ड ट्रंप द्वारा पेश किया गया यह 5,000 डॉलर वाला प्रस्ताव बहुत हद तक भारत की सफल और लोकप्रिय कल्याणकारी योजनाओं से प्रेरित नजर आता है।
अगर पिछले एक दशक के भारतीय राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास पर नजर डालें, तो भारत के कल्याणकारी राज्य के स्वरूप में एक क्रांतिकारी बदलाव आया है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' यानी डीबीटी (DBT) योजना ने सरकार और आम जनता के बीच के पारंपरिक वित्तीय संबंधों को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है।
इस डिजिटल व्यवस्था के तहत सरकारी सहायता का पैसा बिचौलियों के बिना सीधे पात्र नागरिकों और मतदाताओं के बैंक खातों में ट्रांसफर होने लगा है। आज स्थिति यह है कि जिस देश के किसी भी कोने में बैठे आम वोटर के बैंक खाते में सीधे सरकारी मदद या योजना का पैसा पहुंचता है, उसे सरकार की नीतियों या उपलब्धियों को समझाने के लिए किसी राजनीतिक नेता या भाषण की आवश्यकता नहीं होती।
चुनावी नतीजों के लिहाज से भारत में यह तरीका एक अचूक और बेहद असरदार हथियार साबित हुआ है, जिसे देश के विभिन्न राज्यों की सरकारों ने और अधिक व्यापक रूप देते हुए महिलाओं और युवाओं के लिए नकद सहायता के रूप में आगे बढ़ाया है। ट्रंप की यह नीति भले ही अमेरिकी कांग्रेस की वैधानिक बाधाओं और जटिलताओं के कारण पूरी तरह से वैसी न हो, लेकिन इसके पीछे की राजनीतिक मनोवैज्ञानिक सोच वही है जिसे भारतीय राजनेताओं ने बहुत पहले से अपनी चुनावी सफलता का आधार बना रखा है।
फेडरल चुनावों में सख्त फोटो वोटर ID लागू करने पर जोर और भारत-ब्राजील की व्यवस्था का जिक्र नकद प्रोत्साहन के अलावा, अमेरिकी चुनावी प्रणाली में एक और बहुत बड़ा बदलाव डोनल्ड ट्रंप के उस कड़े रुख में दिखाई दे रहा है जिसमें वे मतदान के लिए सख्त फोटो पहचान पत्र (वोटर ID) को अनिवार्य बनाने की पुरजोर वकालत कर रहे हैं।
मार्च 2025 में फेडरल चुनाव प्रक्रियाओं और चुनावी पारदर्शिता में सुधार के लिए जारी किए गए अपने एक महत्वपूर्ण कार्यकारी आदेश (एग्जीक्यूटिव ऑर्डर) में डोनल्ड ट्रंप ने विशेष रूप से भारत और ब्राजील जैसे बड़े लोकतांत्रिक देशों का हवाला दिया था। ट्रंप ने अपने आदेश और भाषणों में इस बात की सराहना की थी कि कैसे भारत और ब्राजील जैसे देशों में मतदाताओं की पहचान को पुख्ता करने के लिए बायोमेट्रिक डेटाबेस और सख्त फोटो पहचान पत्रों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे फर्जी मतदान की गुंजाइश लगभग समाप्त हो जाती है।
इसी तर्ज पर अमेरिका में भी चुनावी शुद्धता लाने के लिए ट्रंप ने 'द सेव अमेरिका एक्ट' को तुरंत पारित करवाने की मांग की है। इस प्रस्तावित सख्त कानून के तहत अब फेडरल स्तर पर होने वाले सभी चुनावों में मतदान के लिए नागरिकता का ठोस सबूत और सरकार द्वारा जारी आधिकारिक फोटो ID होना पूरी तरह से अनिवार्य कर दिया जाएगा, जो अमेरिकी चुनावी इतिहास में एक बड़ा और कड़ा कदम माना जा रहा है।
अमेरिकी लोकतंत्र में पारंपरिक तरीकों से हटकर आक्रामक और लोकलुभावन नीतियों का दौर डोनल्ड ट्रंप के इन नए और आक्रामक राजनीतिक प्रस्तावों से यह साफ जाहिर होता है कि अमेरिका की दो-दलीय चुनावी राजनीति अब पारंपरिक और वैचारिक बहसों से आगे निकलकर सीधे तौर पर आर्थिक लाभ और मतदाता के व्यक्तिगत कल्याण से जुड़ने लगी है।
हालांकि ट्रंप के इन प्रस्तावों को लेकर अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस में तीखा विरोध देखने को मिल रहा है और विपक्षी डेमोक्रेट्स तथा कई रिपब्लिकन नेता भी इसे लेकर आशंकित हैं कि देश के राजकोष पर इसका कितना भारी असर पड़ेगा, फिर भी ट्रंप की यह शैली अमेरिकी जनता के एक बड़े वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करने में पूरी तरह कामयाब रही है।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि जब दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्र एक-दूसरे की चुनावी रणनीतियों और कल्याणकारी मॉडलों से सीखने या उन्हें अपने अनुकूल ढालने लगते हैं, तो इससे वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र का एक नया ही स्वरूप उभरकर सामने आता है। आने वाले अमेरिकी चुनावों में ट्रंप के ये लोकलुभावन और कड़े प्रशासनिक वादे चुनावी परिणामों को किस हद तक प्रभावित करते हैं, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इसने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक राजनीति में जनता के सीधे सशक्तिकरण और पहचान की सुरक्षा के मुद्दे ही सबसे बड़े चुनावी हथियार बन चुके हैं।
📡 स्रोत: NewsData.io