Explained: दिल्ली SIR में 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' क्या और कितने तरह की है? कैसे करें सामना
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22 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने जब चुनाव आयोग से 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' की डेफिनेशन पूछी, तो यह सवाल हर किसी के मन में आना लाजमी है कि आखिर यह क्या बला है.
सीधे शब्दों में कहें तो यह वोटर के पुराने रिकॉर्ड और मौजूदा डेटा के बीच का वह अंतर है, जो कंप्यूटर के हिसाब से 'तार्किक यानी लॉजिकल' नहीं लगता.
अगर डेटा में कुछ ऐसा है जो आम इंसानी की समझ में नहीं आ रहा है, तो सिस्टम उसे फ्लैग कर देता है. तो आइए जानते हैं कि यह क्या है और कितनी तरह की है...
यह 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' होती क्यों है?
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह पुराने डेटा का सटीक मिलान न होना है.
जब 2002 की वोटर लिस्ट (पिछली SIR) और आज के डिजिटल रिकॉर्ड को आपस में जोड़ा जाता है, तो कई तरह की तकनीकी दिक्कतें आती हैं:
मैन्युअल एंट्री की गलतियां: पहले के रिकॉर्ड हाथ से भरे जाते थे, जिससे नाम की स्पेलिंग, उम्र या पता लिखने में गलती हो सकती है.
जब यह डेटा डिजिटल सिस्टम में जाता है, तो यह गलती एक 'डिस्क्रिपेंसी' बन जाती है.
जीवन की घटनाएं: शादी, तलाक, मृत्यु या पलायन जैसी घटनाओं के कारण वोटर की जानकारी समय के साथ बदलती रहती है.
अगर यह बदलाव सिस्टम में अपडेट नहीं हो पाता, तो यह विसंगति पैदा करता है.
तकनीकी सीमाएं: कंप्यूटर सिस्टम को सिर्फ 'हां' या 'ना' में जवाब चाहिए होता है.
अगर नाम की स्पेलिंग में एक भी अक्षर का फर्क है, तो सिस्टम उसे मैच नहीं मानता और नोटिस जारी कर देता है.
'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' कितनी तरह की होती है, 11 या 7?
यह संख्या अलग-अलग राज्यों और समय-समय पर बदलती रही है. शुरुआत में पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान इसे 4 कैटेगरी में रखा गया था.
बाद में जब दूसरे राज्यों में यह प्रक्रिया शुरू हुई, तो इसे बढ़ाकर 7 कैटेगरी कर दी गईं. अब दिल्ली SIR में चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने 11 कैटेगरी की पहचान की है:
📡 स्रोत: ABP Live