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Explained: फ्रांस से लेकर पुर्तगाल और इटली तक, आखिर क्यों सुलग रहा है यूरोप

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 19 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
Explained: फ्रांस से लेकर पुर्तगाल और इटली तक, आखिर क्यों सुलग रहा है यूरोप

वर्तमान समय में दुनिया के कई प्रमुख देशों में गंभीर आर्थिक संकट, महंगाई, आवास की भारी कमी और जीवनयापन के बढ़ते खर्च के खिलाफ जनता का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा है.

फ्रांस में चल रहे हिंसक प्रदर्शनों की गूंज के साथ-साथ यूरोप और अन्य महाद्वीपों के कई देशों में भी हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं.

आइए जानते हैं कि फ्रांस के अलावा इस समय दुनिया के किन-किन देशों में प्रदर्शन हो रहे हैं, वहां क्या नुकसान हुआ है, कितने लोग घायल हुए हैं और क्या स्थिति बनी हुई है.

पुर्तगाल पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन के मुख्य ऐतिहासिक चौराहों (जैसे रोसियो स्क्वायर) और अन्य बड़े शहरों में हज़ारों लोगों ने प्रदर्शन किए हैं.

स्पेनिश 'अकाम्पदा' आंदोलन से प्रेरित होकर प्रदर्शनकारियों ने इन इलाकों में बड़ी संख्या में टेंट कैंप लगाकर डेरा डाल लिया है. यहां मुख्य संकट आवास संकट और आसमान छूते किराए व प्रॉपर्टी के दाम हैं.

अनियंत्रित पर्यटन और विदेशी निवेशकों द्वारा रियल एस्टेट की खरीद के कारण स्थानीय लोगों के लिए घर खरीदना या किराए पर लेना असंभव हो गया है.

लोग खुद को बेघर महसूस कर रहे हैं हालांकि यह आंदोलन मुख्य रूप से टेंट कैंप लगाकर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें मनवाने पर केंद्रित है, लेकिन राजधानी में आवास माफिया और सरकार के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश के चलते यातायात और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गई है.

इटली इटली के मिलान और अन्य प्रमुख औद्योगिक शहरों में छात्रों और नागरिकों ने महंगाई और आर्थिक बदहाली के खिलाफ बड़े पैमाने पर मार्च निकाले, जो कई जगहों पर हिंसक झड़पों में तब्दील हो गए.

जीवनयापन के बढ़ते खर्च, सार्वजनिक सेवाओं जैसे स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाली और गिरते जीवन स्तर के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे हैं.

मिलान और अन्य शहरों में हुए हिंसक प्रदर्शनों के दौरान उग्र भीड़ ने दुकानों के शीशे तोड़े और तोड़फोड़ की. इस हिंसा में 140 से अधिक पुलिस अधिकारी/कर्मचारी घायल हो गए.

कानून व्यवस्था बिगाड़ने और उपद्रव करने के आरोप में पुलिस ने कम से कम 40 से 45 लोगों को गिरफ्तार किया है.

सरकार ने स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सबको है, लेकिन उपद्रव करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा. स्पेन स्पेन में आवास संकट को लेकर स्थिति सबसे ज्यादा विस्फोटक हो चुकी है.

मैड्रिड के प्रसिद्ध 'पुएर्ता डेल सोल' स्क्वायर से लेकर बार्सिलोना और मलागा तक हज़ारों टेंट लगाए गए हैं.

एक बुजुर्ग महिला के हाई-प्रोफाइल निष्कासन और आसमान छूते किराए के बाद पूरे देश में गुस्सा भड़क उठा.

लोग किफायती घरों की मांग, 'वल्चर फंड्स' द्वारा प्रॉपर्टी कब्जाने पर रोक और किराए पर सख्त नियंत्रण चाहते हैं.

देश भर में हिंसक झड़पों के दौरान दर्जनों पुलिसकर्मी घायल हुए हैं और कई प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया है.

यहां तक कि राजनीतिक दलों के बीच भी इस मुद्दे पर भारी घमासान मचा हुआ है, जिसके चलते सरकार को आपातकालीन नीतियां लानी पड़ी हैं.

अल्बानिया अल्बानिया की राजधानी तिराना में प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर हजारों की संख्या में लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे.

देश में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों, बढ़ती महंगाई और चरमराती अर्थव्यवस्था के खिलाफ विपक्षी दलों और आम नागरिकों ने सरकार के इस्तीफे की मांग को लेकर उग्र प्रदर्शन किया.

प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री कार्यालय पर मोलोटव कॉकटेल (पेट्रोल बम), आतिशबाजी और स्मोक बम फेंके.

सरकारी इमारत के बाहर सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों के साथ तीखी झड़पें हुईं, जिसमें कई लोग और सुरक्षाकर्मी घायल हो गए. तिराना के मुख्य मार्ग बंद करने पड़े और भारी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा.

केन्या यूरोप से बाहर अफ्रीकी देश केन्या में भी आर्थिक दबाव के चलते देशव्यापी तनाव और हड़तालें देखने को मिल रही हैं.

देश में ईंधन के आसमान छूते दामों, बढ़ते करों और महंगाई के कारण आम जनता का जीना दूभर हो गया है.

ईंधन और टैक्स बढ़ोतरी के विरोध में ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स, राइड-हॉइलिंग ड्राइवर्स (कैब चालक) और यूनिवर्सिटी के लेक्चरार्स ने बड़े पैमाने पर हड़तालें कीं.

यातायात बाधित होने और आर्थिक गतिविधियों के ठप होने से देश की अर्थव्यवस्था को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा है. फ्रांस से शुरू हुआ यह असंतोष अब वैश्विक रूप लेता जा रहा है.

चाहे वह फ्रांस की जली हुई गाड़ियां हों, इटली के शहरों में घायल होते पुलिसकर्मी और गिरफ्तारियां हों, पुर्तगाल और स्पेन के चौराहों पर लगे हजारों टेंट हों, अल्बानिया में प्रधानमंत्री दफ्तर पर फेंके गए मोलोटव कॉकटेल हों, या केन्या में ठप पड़े ट्रांसपोर्ट सिस्टम हों, इन सबकी जड़ में एक ही सच्चाई है: आम आदमी की पहुंच से दूर होती बुनियादी जरूरतेंं और सरकारों की वित्तीय विफलताएं.

📡 स्रोत: NewsData.io

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