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Explainer: अमेरिका में चुनाव, इजरायल में सियासी उलझन और ईरान से तनाव, क्या महंगा होगा भारत का कच्चा तेल?

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 3 नवंबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
Explainer: अमेरिका में चुनाव, इजरायल में सियासी उलझन और ईरान से तनाव, क्या महंगा होगा भारत का कच्चा तेल?

US Midterm Elections 2026: अमेरिका में आज मिड टर्म चुनाव है.

ये चुनाव सिर्फ संसद की कुछ सीटों के लिए चुनाव नहीं है, बल्कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले 2 वर्षों के कामकाज का भी इम्तिहान है.

इस चुनाव से यह तय होगा कि आने वाले समय में अमेरिकी संसद किस पार्टी का दबदबा रहेगा.

इन चुनाव के नतीजों का असर ट्रंप की घरेलू नीतियों से लेकर उनके आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय फैसलों तक भी दिखाई देगा. लेकिन इस चुनाव की अहमियत सिर्फ अमेरिका की राजनीति तक सीमित नहीं है.

इन दिनों पश्चिम एशिया में भी एक साथ कई घटनाक्रम चल रहे हैं. जिससे भारत के बाजार पर खतरा मंडरा रहा है.

पहले बात इजरायल की करें तो यहां हाल ही में हुए चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है.

वहीं, ईरान पर अमेरिका ने फिर हमला बोल दिया है, अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष खत्म नहीं हो रहा है. युद्धविराम की कोशिशों के बावजूद दोनों पक्षों के बीच तनाव बना हुआ है.

बता दें इन घटनाओं के बीच भारत के लिए सबसे अहम है कच्चे तेल की कीमतें.

अगर ईरान और इजरायल के बीच तनाव खत्म नहीं होता और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की सप्लाई प्रभावित रहती है तो इसका असर भारत के आयात बिल, रुपये और महंगाई पर पड़ सकता है.

इसके अलावा एक्सपर्ट के मुताबिक इससे शेयर बाजार में भी कुछ सेक्टरों पर दबाव बढ़ने की उम्मीद है. अमेरिका में मिडटर्म चुनाव क्या है और ट्रंप के लिए ये क्यों अहम है?

अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हर चार साल में होता है जबकि प्रतिनिधि सभा और सीनेट के चुनाव हर दो साल में होते हैं.

राष्ट्रपति चुनाव के बीच में होने वाले संसदीय चुनाव को मिडटर्म यानी मध्यावधि चुनाव कहा जाता है.

जानकारी के मुताबिक इन मिडटर्म चुनावों में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं. बता दें यह राष्ट्रपति का चुनाव नहीं है. डोनाल्ड ट्रंप जनवरी 2029 तक राष्ट्रपति बने रहेंगे.

अमेरिका की कांग्रेस में होते हैं दो सदन, ये भी जानें... अमेरिका में एक हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स होता है, जिसमें कुल 435 सदस्य होते हैं. इन सभी सीटों पर हर 2 साल में चुनाव होते हैं.

दूसरा यहां सीनेट होता है, इसमें कुल 100 सदस्य होते हैं.

बता दें कि यहां सीनेटर 6 साल के लिए चुने जाते हैं और हर 2 साल में करीब एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होता है. अमेरिका में चुनाव के बाद के 61 दिन क्यों होंगे अहम?

अमेरिकी चुनाव में एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि नतीजे आने और नई कांग्रेस के कामकाज शुरू होने के बीच करीब दो महीने का अंतर रहता है. अमेरिकी कानून के मुताबिक नई कांग्रेस का कार्यकाल 3 जनवरी 2027 से शुरू होगा.

यानी 3 नवंबर को चुनाव होने के बाद भी मौजूदा कांग्रेस करीब 61 दिन तक काम करती रहेगी.

इस बीच ट्रंप को चुनावी नतीजों से यह पता चल जाएगा कि जनवरी से उन्हें किस तरह की राजनीतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा. क्या अमेरिकी चुनाव के बाद ईरान पर ट्रंप का रुख बदल सकता है?

ईरान को लेकर अमेरिका की नीति में राष्ट्रीय सुरक्षा, परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध और पश्चिम एशिया में उसके प्रभाव जैसे कई मुद्दे शामिल हैं. मंगलवार को ही ईरान के दक्षिणी इलाकों में हमला हुआ है.

होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित केशम द्वीप और बंदर लेंगेह में विस्फोटों की आवाज सुनी गई. ऐसे में दोनों के बीच संबंध सुधरने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है.

काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (CFR) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज जलडमरूमध्य और प्रतिबंधों में राहत जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है.

इजरायल में सरकार बनाने का संकट क्या है? इजरायल में 27 अक्टूबर को संसदीय चुनाव हुए थे.

नतीजों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाला खेमा सबसे आगे रहा लेकिन फिर भी वह सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत हासिल नहीं कर पाया. दरअसल, इजरायल की संसद को नेसेट (Knesset) कहा जाता है.

इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं. बता दें सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है. यहां नेतन्याहू का खेमा बहुमत से आठ सीट पीछे है.

वहीं विपक्षी खेमे को भी सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों के समर्थन की जरूरत है. इजरायल चुनाव का असर यहां की घरेलू राजनीति तक ही सीमित नहीं है. भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम क्यों महत्वपूर्ण है?

विदेशी नीति के जानकारों की मानें तो भारत के पश्चिम एशिया में कई महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक हित हैं.

भारत के लिए इस क्षेत्र से कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति, समुद्री व्यापार, रक्षा सहयोग और लाखों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा जैसे मुद्दे जुड़े हुए हैं.

भारत और इजरायल के बीच रक्षा उपकरणों, ड्रोन, मिसाइल तकनीक, कृषि, जल प्रबंधन और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग है.

क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और कूटनीतिक संतुलन की चुनौती भारत और ईरान का चाबहार बंदरगाह रणनीतिक रूप से अहम है.

इसके माध्यम से भारत को पाकिस्तान को पार किए बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने का विकल्प मिलता है.

ईरान के साथ तनाव बढ़ने पर भारत के सामने सिर्फ तेल की समस्या नहीं होगी, बल्कि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और कूटनीतिक संतुलन की चुनौती भी होगी. कच्चा तेल महंगा हुआ तो भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?

भारत दुनिया के बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है. घरेलू जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदे गए कच्चे तेल से पूरा होता है.

पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने कुल 259.79 मिलियन मीट्रिक टन कच्चे तेल का आयात किया. इसमें आयात निर्भरता करीब 88.6 फीसदी रही.

अगर भारत को उतनी ही मात्रा में तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ें तो देश का आयात बिल बढ़ जाएगा. इससे व्यापार घाटे पर दबाव आ सकता है. वहीं, कच्चा तेल खरीदने के लिए भारत को डॉलर की जरूरत होती है.

तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ सकती है. इससे रुपये पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है.

इसके अलावा तेल महंगा होने पर पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की लागत बढ़ सकती है. इसका असर परिवहन, माल ढुलाई, उत्पादन और कृषि से जुड़ी लागत पर भी पड़ सकता है.

भारतीय शेयर बाजार में किन सेक्टरों पर पड़ सकता है सबसे ज्यादा असर?

अगर पश्चिम एशिया का तनाव बढ़ता है और कच्चा तेल महंगा होता है तो भारतीय शेयर बाजार में सभी कंपनियों पर एक जैसा असर नहीं पड़ेगा.

कुछ कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जबकि कुछ कंपनियों को ऊंची कीमतों से फायदा भी हो सकता है.

जैसे एविएशन सेक्टर की बात करें तो एयरलाइंस कंपनियों के कुल खर्च में विमान ईंधन यानी ATF की बड़ी हिस्सेदारी होती है. कच्चा तेल महंगा होने पर ATF की कीमत बढ़ सकती है. इससे कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव आएगा.

इसी तरह पेंट बनाने में इस्तेमाल होने वाले कई केमिकल और कच्चे माल पेट्रोलियम आधारित होते हैं. कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर इनकी लागत भी बढ़ सकती है.

वहीं, टायर बनाने में इस्तेमाल होने वाले सिंथेटिक रबर, कार्बन ब्लैक और अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कीमतें बढ़ने पर लागत बढ़ सकती है.

📡 स्रोत: NewsData.io

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