Explainer: क्या पूरी दुनिया में चल रही है 'गुस्से की लहर'? फ्रांस से अर्जेंटीना तक सड़कों पर उतरे लोग, हर देश की वजह जानकर चौंक जाएंगे...
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Protests in 8 countries worldwide: दुनिया के कई देशों में इन दिनों लोग महंगाई, शिक्षा बजट की कटौती, बेरोजगारी और सरकारी नीतियों के खिलाफ सड़कों पर हैं.
सबसे बड़ी तस्वीर फ्रांस से आई है, जहां शनिवार को लाखों लोगों ने मार्च निकाला.
इसके अलावा बेल्जियम, पुर्तगाल, इटली, अल्बानिया, तुर्किये, अर्जेंटीना और अमेरिका में भी अलग-अलग मुद्दों पर प्रदर्शन चल रहे हैं. सवाल उठ रहा है कि क्या ये सब एक ही आंदोलन का हिस्सा हैं. फ्रांस में आखिर हो क्या रहा है?
फ्रांस के इन प्रदर्शनों की शुरुआत पिछले महीने पेरिस के उत्तरी इलाके के कुछ हाईस्कूलों से हुई थी. वहां शिक्षकों की कमी और स्कूलों की खराब हालत को लेकर गुस्सा था.
धीरे-धीरे यह मुद्दा बढ़कर महंगाई, ईंधन के दाम, असमानता और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच गया. 17 अक्टूबर को पूर्व 'येलो वेस्ट' आंदोलनकारी भी छात्रों के साथ जुड़ गए. 17 अक्टूबर के प्रदर्शन में कितने लोग शामिल हुए?
फ्रांस के गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज के मुताबिक देशभर की 110 रैलियों में करीब 5.5 लाख लोग शामिल हुए, जिनमें 1.10 लाख पेरिस में थे.
वहीं, सीजीटी जैसे श्रमिक संगठनों और छात्र संगठनों ने यह संख्या करीब 8 लाख बताई है.
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ये प्रदर्शन येलो वेस्ट आंदोलन के चरम की तुलना में छोटे थे लेकिन 2023 में पेंशन सुधार के खिलाफ हुए बड़े प्रदर्शनों से भी कम बताए गए हैं. क्या फ्रांस में हिंसा भी हुई?
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक फ्रांस में कई जगह झड़पें, आगजनी और लूटपाट की घटनाएं हुईं हैं. गृह मंत्री ने बताया कि पूरे देश में करीब 400 लोगों को गिरफ्तार किया गया है.
उन्होंने इस हिंसा के लिए कट्टर वामपंथ को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि लूटपाट मौके का फायदा उठाने वालों ने की है. सरकार ने इस पर क्या कदम उठाए?
रिपोर्टों में बताया गया है कि सरकार ने आपातकालीन उपाय के तौर पर 3,000 अतिरिक्त शिक्षक देने की पेशकश की थी. लेकिन छात्र और शिक्षक संगठनों ने इसे ठुकरा दिया. उनकी मांग व्यवस्था में बड़े बदलाव की है.
यह आंदोलन राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है खासकर तब जब आने वाले राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियां चल रही हैं. बता दें वामपंथी नेता जौं-लुक मेलेंशों भी पेरिस के मार्च में शामिल हुए.
बेल्जियम, पुर्तगाल और इटली में क्या हालात हैं?
बेल्जियम में छात्रों ने सार्वजनिक खर्च में कटौती और विश्वविद्यालय की रजिस्ट्रेशन फीस बढ़ाने का विरोध किया है.
बता दें प्रदर्शनकारियों पर ब्रसेल्स और लिएज में पुलिस को वाटर कैनन का इस्तेमाल करना पड़ा.
वहीं, पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में हजारों लोगों ने बढ़ती महंगाई, कम वेतन और मकान की कीमतों के खिलाफ मार्च निकाला.
रिपोर्ट में बताया गया है कि 2017 के बाद वहां संपत्ति की कीमतें दोगुनी से ज्यादा हो चुकी हैं.
वहीं इटली के मिलान में स्थिर वेतन और महंगाई को लेकर प्रदर्शन हुए और झड़पों की खबरें आईं हैं. अल्बानिया में छात्र क्यों सड़कों पर हैं?
अल्बानिया की राजधानी तिराना में छात्र विश्वविद्यालयों की खराब हालत, महंगी पढ़ाई और डिग्री के बाद रोजगार की कमी को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. 13 अक्टूबर को शिक्षा मंत्रालय के बाहर प्रदर्शन हिंसक हो गया जिसमें छात्रों ने इमारत पर ईंटें और कंक्रीट के ब्लॉक फेंके और पुलिस ने कार्रवाई की.
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक तीसरे दिन भी प्रदर्शन जारी रहे और प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफे की मांग की. तुर्किये और अर्जेंटीना में क्या हो रहा है?
तुर्किये में पिछले महीने पेंशनभोगियों और श्रमिक संगठनों ने बढ़ती महंगाई और कम पेंशन के खिलाफ प्रदर्शन किया.
अंकारा में संवैधानिक अदालत के बाहर जमा पेंशनभोगियों ने सम्मान के साथ जीने के अधिकार की मांग की.
अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में राष्ट्रपति जेवियर माइली की उच्च शिक्षा में बजट कटौती की नीति के खिलाफ हजारों छात्र, कर्मचारी और यूनियन सदस्य संसद के बाहर जुटे.
प्रदर्शन ज्यादातर शांतिपूर्ण रहा लेकिन कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पथराव किया. अमेरिका के 'नो किंग्स' प्रदर्शन बाकी देशों से कैसे अलग हैं?
अमेरिका में 17 अक्टूबर को 'नो किंग्स: वोट अर्ली' नाम से रैलियां हुईं, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का विरोध करने वाले नेटवर्क ने आयोजित कीं.
इनका मकसद 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले लोगों से जल्दी मतदान करने की अपील करना था.
इन्हें निष्पक्ष कार्यक्रम बताया गया लेकिन ये लगभग दो साल से चल रहे ट्रंप-विरोधी प्रदर्शनों की ही कड़ी माने जा रहे हैं. भारत में इसका क्या कनेक्शन बताया जा रहा है?
भारत में मतदाता सूची के एसआईआर में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं.
कनॉट प्लेस में हुए प्रदर्शन के बाद दिल्ली पुलिस ने कई एफआईआर दर्ज की हैं और बार-बार नियम तोड़ने वालों पर सख्ती की बात कही है.
हालांकि भारत के मुद्दे विदेशों के मुद्दों से अलग हैं, इसलिए इन्हें एक ही आंदोलन का हिस्सा बताना ठीक नहीं होगा. इन सभी प्रदर्शनों में कॉमन क्या है? कई जगह पैटर्न एक जैसा दिखता है.
महंगाई और रहने-खाने का बढ़ता खर्च, शिक्षा बजट में कटौती, नौकरी के मौके कम होना और मकान महंगे होना, ये मुद्दे अलग-अलग देशों में बार-बार सामने आ रहे हैं.
फ्रांस, अल्बानिया, बेल्जियम और अर्जेंटीना में छात्र और युवा प्रदर्शनों में अहम भूमिका निभा रहे हैं. तो क्या यह कोई एक वैश्विक आंदोलन है?
मीडिया रिपोर्टों में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि ये प्रदर्शन आपस में किसी तरह जुड़े या समन्वित हैं.
फ्रांस का आंदोलन स्कूलों और महंगाई से शुरू हुआ, अल्बानिया का विश्वविद्यालयों और प्रधानमंत्री के खिलाफ है. तुर्किये का पेंशन पर है और अमेरिका का चुनाव और मतदान पर केंद्रित है.
इन सबका उभार एक ही समय पर जरूर दिख रहा है लेकिन हर देश की वजह और राजनीतिक संदर्भ अलग है. Explainer: रामलीला में शूर्पणखा का ‘I Love You’, रावण के साथ जलेगा कॉकरोच! सनातन की नई प्रस्तुति या मर्यादा से खिलवाड़?
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📡 स्रोत: NewsData.io