विदेश

गयाजी- 16 दिन में 1200 करोड़ का कारोबार:पितृपक्ष मेले में देश-विदेश से पहुंचे 51 लाख तीर्थ यात्री, 5 लाख लोगों को मिला रोजगार

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 11 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
गयाजी- 16 दिन में 1200 करोड़ का कारोबार:पितृपक्ष मेले में देश-विदेश से पहुंचे 51 लाख तीर्थ यात्री, 5 लाख लोगों को मिला रोजगार

गयाजी में पितृपक्ष मेले का समापन हो गया है। जिला प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक इस बार 51 लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचे। किसी ने फल्गु नदी में पिंडदान किया तो किसी ने विष्णुपद और अक्षयवट में कर्मकांड पूरा किया। खास बात यह कि इन 16 दिनों में सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं हुए। जिले की अर्थव्यवस्था भी तेजी से दौड़ती रही।

पूजा सामग्री से लेकर पीतल के बर्तन, फूल-माला, मिठाई, होटल, धर्मशाला, भोजन और परिवहन तक का कारोबार बढ़ा। छोटे दुकानदारों से लेकर होटल संचालकों और स्थानीय कारोबारियों तक को कमाई का भरपूर मौका मिला। चैंबर ऑफ कॉमर्स के जिला अध्यक्ष प्रमोद भदानी के अनुमान के मुताबिक, मेला क्षेत्र में ही 1,000 से 1,200 करोड़ रुपए का कारोबार हुआ होगा।

यह अलग-अलग कारोबार के आकलन पर आधारित अनुमान है, कोई आधिकारिक सरकारी आंकड़ा नहीं। 5000 रुपए प्रति श्रद्धालु खर्च का अनुमान प्रमोद भदानी बताते हैं कि एक श्रद्धालु का खर्च केवल पिंडदान तक सीमित नहीं रहता। घर से निकलते ही ट्रेन, बस या विमान का किराया शुरू हो जाता है। गयाजी पहुंचने के बाद स्थानीय परिवहन, होटल या धर्मशाला, भोजन, पूजा सामग्री, बर्तन और पुरोहित की दक्षिणा पर पैसे खर्च होते हैं।

अनुमान के मुताबिक, एक श्रद्धालु औसतन 5,000 रुपए खर्च करता है तो 51.30 लाख श्रद्धालुओं के हिसाब से यह राशि करीब 2,565 करोड़ रुपए बैठती है। हालांकि, यह पूरे यात्रा खर्च का अनुमान है। इसे स्थानीय बाजार का कारोबार नहीं माना जा सकता। इसमें आने-जाने का किराया और रास्ते में होने वाला खर्च भी शामिल है।

भोजन से लेकर पूजा सामग्री तक करोड़ों का कारोबार पितृपक्ष में सबसे ज्यादा मांग पूजा सामग्री, भोजन और आवासन से जुड़ी सेवाओं की रहती है। स्थानीय व्यापारिक प्रतिनिधियों के मुताबिक, 16 दिनों में भोजन के कारोबार का अनुमान 125 से 150 करोड़ रुपए तक है। इसमें छोटे भोजनालय, सड़क किनारे की दुकानें, मिठाई की दुकानें, कैटरर और रेस्टोरेंट शामिल हैं।

पिंडदान के लिए जौ का आटा, तिल, फूल, अगरबत्ती, मिट्टी के दीपक और दूसरी पूजन सामग्री की मांग बढ़ जाती है। हालांकि यह बेहद सस्ते दाम में मिल जाते है, लेकिन इनकी बिक्री बढ़ जाती है। श्रद्धालु कर्मकांड के लिए पीतल के बर्तन और दूसरे सामान भी खरीदते हैं। कारोबारियों के मुताबिक, पूजा सामग्री और बर्तनों का संयुक्त कारोबार 200 करोड़ रुपए से अधिक हो सकता है।

कुछ स्थानीय आकलनों में यह राशि 250 करोड़ रुपए तक बताई गई है। इसमें दान में दिए जाने वाले वस्त्र भी शामिल हैं। पुरोहितों को दी जाने वाली दक्षिणा का कोई समेकित व प्रमाणित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इस कारण इसे अलग से जोड़कर कारोबार का पक्का आंकड़ा बताना मुश्किल है। होटल और टूरिज्म में 225 करोड़ से ज्यादा का अनुमान पितृपक्ष में गयाजी के साथ बोधगया के होटल और टूर एंड ट्रैवल्स कारोबार को भी फायदा हुआ।

होटल एसोसिएशन के महासचिव सुदामा के मुताबिक, होटल और टूर एंड ट्रैवल्स क्षेत्र में संयुक्त रूप से 225 करोड़ रुपए से अधिक के कारोबार का अनुमान है। हालांकि, होटल कारोबार की शुरुआती उम्मीद इससे ज्यादा थी। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने व्यावसायिक होटलों के बजाय धर्मशालाओं और प्रशासन की ओर से उपलब्ध कराई गई आवासन सुविधाओं में ठहरना पसंद किया।

इससे होटलों की संभावित कमाई प्रभावित हुई। एक श्रद्धालु का खर्च 3,300 रुपए से ज्यादा प्रमोद भदानी के आकलन के मुताबिक, एक श्रद्धालु का स्थानीय खर्च जोड़ें तो तस्वीर और साफ होती है। रेलवे स्टेशन से पिंड वेदियों, होटल और दूसरे धार्मिक स्थलों तक आने-जाने में करीब 300 रुपए खर्च होते हैं।

पूजा सामग्री पर औसतन 750 रुपए, होटल या आवासन पर 750 रुपए, भोजन पर 500 रुपए और बर्तन की खरीदारी पर 500 रुपए खर्च की संभावना है। पुरोहित को 500 रुपए दक्षिणा देने पर कुल राशि 3,300 रुपए हो जाती है। यह एक अनुमानित और न्यूनतम खर्च का उदाहरण है। श्रद्धालु की संख्या, ठहरने की अवधि और खरीदारी के हिसाब से खर्च घट-बढ़ सकता है।

घर से गयाजी आने-जाने का किराया और दूसरे खर्च जोड़ने पर प्रति व्यक्ति खर्च 5,000 रुपए तक पहुंच सकता है। छोटी दुकानों से पुरोहितों तक रोजगार का बड़ा नेटवर्क पितृपक्ष मेला केवल बड़े कारोबारियों की कमाई का जरिया नहीं है। इससे छोटे दुकानदार, मजदूर, वाहन चालक, ई-रिक्शा चालक, डोली उठाने वाले, सफाईकर्मी और भोजनालयों में काम करने वाले लोगों को भी काम मिलता है।

चैंबर ऑफ कॉमर्स के जिला अध्यक्ष प्रमोद भदानी के मुताबिक, स्थानीय जानकारों का अनुमान है कि मेले की अवधि में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 5 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिलता है। पिंड वेदियों और प्रमुख धार्मिक स्थलों के आसपास छोटी-बड़ी दुकानों की संख्या 50 हजार तक होने का अनुमान है।

हालांकि, रोजगार पाने वालों और दुकानों की संख्या का आधिकारिक सर्वेक्षण उपलब्ध नहीं है। प्रेतशिला पर डोली उठाने वालों से लेकर विष्णुपद, देवघाट, सीताकुंड, रामशिला और बोधगया में काम करने वाले दुकानदारों तक को इसका लाभ मिलता है। पुरोहितों के यहां यजमानों की अगवानी और सेवा में भी स्थानीय लोग जुटते हैं।

इसके अलावा परिवहन, सफाई, भोजन और आवासन से जुड़े कार्य में भी अतिरिक्त हाथों की जरूरत पड़ती है। स्थानीय परिवहन से लेकर सरकारी खजाने तक पहुंचता है पैसा पितृपक्ष में ऑटो, टोटो, ई-रिक्शा, टैक्सी और दूसरी गाड़ियों की मांग बढ़ जाती है। पंडा मणिलाल बारीक के मुताबिक, स्थानीय परिवहन से एक करोड़ रुपए से अधिक के कारोबार का अनुमान है।

हालांकि, इसके लिए भी कोई समेकित आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। कई श्रद्धालु पिंडदान के बाद बोधगया और राजगीर जैसे पर्यटन स्थलों पर भी जाते हैं। मणि लाल बारीक का कहना है कि मेले का आर्थिक असर केवल गयाजी तक सीमित नहीं है। श्रद्धालुओं के रेल, हवाई और सड़क मार्ग से आने-जाने पर भी खर्च होता है।

वाहनों के परमिट, टोल, ईंधन और सामान की खरीदारी से जुड़े करों के जरिए सरकारी खजाने को भी भरपूर राजस्व मिलता है। उनके अनुमान में केंद्र और राज्य सरकारों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 100 करोड़ रुपए से अधिक का लाभ इस बार हो सकता है। हालांकि, इसकी पुष्टि करने वाला कोई समेकित सरकारी आंकड़ा अब तक किसी भी स्तर से उपलब्ध नहीं है।

प्रशासन के आंकड़ों में मेले की तस्वीर जिला प्रशासन के मुताबिक, मेले में 51,30,110 श्रद्धालु पहुंचे। इस दौरान 1,56,208 लोगों ने चिकित्सा सुविधा ली। 1,334 बिछड़े लोगों को उनके परिजनों से मिलाया गया। कंट्रोल रूम में कुल 2,625 शिकायतें दर्ज हुई। टेंट सिटी में 18,126 लोगों ने आवासन किया। श्रद्धालुओं के बीच 69,318 बोतल गंगाजल का वितरण किया गया और पूर्वजों के नाम पर 1,101 पौधे लगाए गए।

सुरक्षा के लिए 15,121 लोगों को हैंडबैंड लगाया गया। भाषा संबंधी परेशानी दूर करने के लिए एआई आधारित अनुवाद सुविधा से 99,444 यात्रियों को मदद मिली। प्रशासन ने अपने स्तर पर आवासन की व्यवस्था भी की थी। पुरोहितों के यहां ठहरने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रति व्यक्ति पांच रुपए की निर्धारित राशि प्रशासन को दी जाती है।

यह राशि श्रद्धालु सीधे नहीं देता, बल्कि पंडा समाज की ओर से जमा की जाती है। इस बार पुरोहितों को प्रतिदिन 60 हजार श्रद्धालुओं तक को अपने यहां ठहराने की अनुमति दी गई थी। आस्था के साथ अर्थव्यवस्था का भी बड़ा केंद्र है गयाजी पितृपक्ष में आने वाला हर श्रद्धालु अपने साथ आस्था के अलावा खर्च की एक पूरी चेन भी लेकर आता है।

इसी खर्च से दुकानदार की बिक्री बढ़ती है, वाहन चालक को सवारी मिलती है, होटल में कमरा भरता है और स्थानीय लोगों को काम मिलता है। 51 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं की मौजूदगी ने एक बार फिर दिखाया कि पितृपक्ष मेला गयाजी के लिए स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार भी है। खास बात यह भी पिंडदान की क्रिया कराने वाले ब्राह्मण को दक्षिणा दिए जाने के बाद सुफल पंडा जी देते हैं।

इनके आशीर्वाद के बिना पुत्रों द्वारा किया गया पिंडदान सफल नहीं माना जाता है। हर श्रद्धालु पंडित को दक्षिणा देने के बाद पंडा को भी दान देता है। दान की कोई सीमा नहीं है। इस विषय पर पंडा तनिक भी नहीं बोलना पंसद नहीं करते हैं। दान में हजारों हजार नगद के अलावा सोना चांदी भी दिया जाता है। लेकिन इसका खुलासा कोई भी तीर्थ पुरोहित गयापाल पंडा नहीं करता है।

इस बात से खुद को दूर रखता है। कई ऐसे तीर्थ पुरोहित हैं जिनके यहां पितृपक्ष में कई बोरे में बगैर गिनती के रखे जाते हैं। उन रुपयों पैसे की गिनती मेले के बाद होती है।

📡 स्रोत: NewsData.io

📰 पूरी खबर पढ़ें (NewsData.io पर जाएं)
J
JKS News Desk

जनता का संदेश की संपादकीय टीम आपके लिए भोपाल, मध्यप्रदेश और देश की सटीक और विश्वसनीय समाचार प्रस्तुत करती है।