गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य : सर्वोच्च न्यायालय
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रायपुर, 6 नवंबर 2026
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की संवैधानिक समय-सीमा उसकी वास्तविक हिरासत शुरू होने के समय से गिनी जाएगी न कि पुलिस द्वारा गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22 (2) के तहत निर्धारित 24 घंटे की अवधि की गणना व्यक्ति को वास्तविक रूप से हिरासत में लिए जाने के समय से होगी। पुलिस की ओर से गिरफ्तारी की औपचारिक कार्रवाई पूरी करने के समय से इसकी गणना नहीं की जा सकती। इस अवधि से अधिक समय तक मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना हिरासत में रखना भी प्रतिबंधित है।
न्यायमूर्ति भुइयां की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि तलाशी और जब्ती की कार्रवाई पूरी होने तथा गिरफ्तारी औपचारिक रूप से दर्ज होने के समय से 24 घंटे की अवधि की गणना करना कानूनन उचित नहीं है और पूरी तरह असंवैधानिक है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना हिरासत में रखा जाता है तो उसे तत्काल रिहा करना होगा।
शीर्ष अदालत ने ओडिशा उच्च न्यायालय के आर्यमान पटनायक मामले, मद्रास उच्च न्यायालय के कन्नन मामले और केरल उच्च न्यायालय के अरुण के. थॉमस मामले में दिए गए विचारों से असहमति जताई। इन मामलों में औपचारिक गिरफ्तारी से पहले हिरासत में बिताई गई अवधि को 24 घंटे की समय-सीमा की गणना से बाहर रखने की अनुमति दी गई थी।
💡 पृष्ठभूमि (Background)
सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की संवैधानिक समय-सीमा उसकी वास्तविक हिरासत शुरू होने के समय से गिनी जाएगी, न कि पुलिस द्वारा गिरफ्तारी दर्ज किए जाने के समय से। यह निर्णय पुलिस और न्याय व्यवस्था के बीच समयसीमा पर विवाद को सुलझाता है। यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे गिरफ्तारियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित होगी, तथा दण्डनीय प्रक्रिया में देरी कम होगी। आम जनता पर इसका असर यह होगा कि उनके अधिकारों की
🎙️ जनता का संदेश का मत
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि न्याय व्यवस्था में समयबद्धता और पारदर्शिता अनिवार्य है। 24 घंटे के भीतर हिरासत में लिए गए व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष पेश करना न केवल उनके अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि समाज में विश्वास भी जगाता है। यह हमें सिखाता है कि जब भी किसी विवाद का सामना हो—चाहे वह घरेलू हो, वित्तीय हो या किसी अन्य क्षेत्र में—तो कानूनी मार्ग अपनाकर शांतिपूर्ण समाधान ढूंढना ही सबसे बेहतर है। इस कदम से हम सभी को यह याद दिलाता है कि न्याय की गति ही समाज की शांति का आधार है।