कामाख्या, सृजन शक्ति का रूप:यहां 15 दिन दुर्गा पूजा, लेकिन गर्भगृह में देवी की मूर्ति ही नहीं; अष्टमी की रात आटे की मानव आकृति की बलि होती है
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →असम के कामाख्या मंदिर में नवरात्रि से सात दिन पहले ही दुर्गा पूजा शुरू हो जाती है। करीब 15 दिन के इस उत्सव में रोज तीन बार देवी की विशेष पूजा होती है। नवरात्रि के पहले दिन एक कन्या की पूजा की जाती है। इसके बाद रोज कन्याओं की संख्या बढ़ती है। इस तरह नौ दिनों में कुल 45 कन्याओं की पूजा होती है।
सप्तमी से पशु बलि के साथ कद्दू, लौकी और गन्ने की बलि देने की भी परंपरा है। आधी रात को आटे से बनी मानव आकृति की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है। ये सभी अनुष्ठान उस शक्तिपीठ में होते हैं, जहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है। यहां चट्टान में बनी प्राकृतिक योनि-आकृति को देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है।
मंदिर में मूर्ति नहीं, चट्टान की योनि-आकृति को पंचगव्य से स्नान कराते हैं कामाख्या मंदिर असम के गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ी पर है। मंदिर का गर्भगृह गुफा की तरह बना है। इसमें सीढ़ियों से नीचे उतरकर देवी के मूल स्थान तक पहुंचते हैं। यहां किसी देवी की मूर्ति नहीं, बल्कि चट्टान में बनी प्राकृतिक योनि-आकृति है।
इस आकृति के बीच से पानी निकलता है। इसलिए चट्टान हमेशा नम रहती है। इसी जगह को देवी का पीठस्थान कहते हैं। नवरात्रि के दौरान इस पीठस्थान का विशेष स्नान कराया जाता है। इसे महास्नान कहते हैं। इसमें पंचगव्य इस्तेमाल होता है, जो गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर से बनता है। स्नान के बाद देवी का श्रृंगार होता है।
फिर पूजा सामग्री और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। इस दौरान चंडी पाठ और हवन भी होते हैं। चंडी पाठ में देवी के अलग-अलग स्वरूपों और असुरों के वध की कथाएं पढ़ी जाती हैं। हवन में देवी मंत्रों के साथ अग्नि में आहुति दी जाती है। नवरात्रि से सात दिन पहले शुरू होती है पूजा, रोज तीन बार विशेष अनुष्ठान कामाख्या में दुर्गा पूजा की शुरुआत पितृपक्ष की नवमी से होती है।
यह नवरात्रि की नवमी तक चलती है। करीब एक पक्ष तक चलने के कारण इसे पखुआ पूजा कहते हैं। इन दिनों देवी की अलग प्रतिमा नहीं बैठाई जाती। गर्भगृह में मौजूद मूल पीठस्थान की पूजा होती है। सुबह, दोपहर और शाम को विशेष अनुष्ठान होते हैं। इन्हें प्रातः पूजा, मध्याह्न पूजा और सायं पूजा कहा जाता है।
इस पूजा के लिए हर साल परंपरागत पुजारियों की टीम चुनी जाती है। अनुष्ठान के समय गर्भगृह में श्रद्धालुओं का प्रवेश रोक दिया जाता है। पूजा पूरी होने के बाद दर्शन शुरू होते हैं। पहले सात दिनों की पूजा के बाद नवरात्रि की प्रतिपदा से विशेष कुमारी पूजा का क्रम शुरू होता है। यह नवमी तक चलता है। इसके बाद सप्तमी से बलि के विशेष अनुष्ठान भी जुड़ जाते हैं।
पहले दिन एक कन्या की पूजा, फिर रोज संख्या बढ़ती है; नवमी पर नौ कन्याओं का पूजन कामाख्या की कुमारी पूजा में रोज कन्याओं की संख्या बढ़ाई जाती है। नवरात्रि के पहले दिन एक कन्या की पूजा होती है। दूसरे दिन दो और तीसरे दिन तीन कन्याओं को पूजते हैं। इसी तरह नवमी पर नौ कन्याओं की पूजा की जाती है।
पूजा के लिए कन्याओं को नए लाल कपड़े पहनाए जाते हैं। फूलों की माला और आभूषणों से सजाया जाता है। फिर सिंदूर, इत्र और अन्य सामग्री से उनकी आराधना होती है। इस परंपरा में कन्या को देवी कामाख्या का जीवित स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि कन्या में सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली देवी शक्ति मौजूद होती है।
इसी कारण यहां कन्याओं की पूजा देवी के रूप में की जाती है। सप्तमी से पशुओं की बलि, आधी रात आटे से बनी मानव आकृति अर्पित करने की परंपरा नवरात्रि की सप्तमी से कामाख्या में बलि के विशेष अनुष्ठान शुरू होते हैं। ये नवमी तक चलते हैं। इनमें भैंसे, बकरे और कबूतर की बलि दी जाती है। देवी को मछली भी अर्पित की जाती है।
बलि से पहले उस खड्ग की पूजा होती है, जिससे पशुओं की बलि दी जाती है। इसे खड्ग पूजा कहते हैं। यहां पशु-पक्षियों के अलावा कद्दू, लौकी और गन्ने की बलि भी दी जाती है। इन चीजों को देवी के सामने अर्पित किया जाता है। कामाख्या में त्रिशूलिनी पूजा की भी परंपरा है। इसमें देवी के त्रिशूल की पूजा होती है।
इस दौरान आधी रात को आटे से मनुष्य के आकार की आकृति बनाई जाती है। फिर देवी के सामने उसकी प्रतीकात्मक बलि दी जाती है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार, यह प्राचीन नरबलि के स्थान पर की जाने वाली प्रतीकात्मक पूजा है। इस अनुष्ठान में मुख्य पुजारी और बलिकाटा नाम के सेवायत शामिल होते हैं। बलिकाटा समूह मंदिर में पशु बलि का काम भी संभालता है।
मंदिर की पूजा से लेकर बलि तक, अलग-अलग परिवार संभालते हैं जिम्मेदारी कामाख्या में पूजा और मंदिर की व्यवस्था कई परंपरागत सेवायत समूह संभालते हैं। इनमें ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण, दोनों समुदायों के परिवार शामिल हैं। मुख्य पूजा बूढ़ा बड़देउरी और डेका बड़देउरी परिवारों के पुजारी करते हैं।
हवन की जिम्मेदारी होता समूह की है। विधिपाठक पूजा के मंत्र और विधियों का पाठ करते हैं। नवरात्रि जैसे विशेष आयोजनों में चंडीपाठक देवी का चंडी पाठ करते हैं। सुपाकार समूह देवी के लिए भोग बनाता है। गैर-ब्राह्मण सेवायतों में बलिकाटा पशु बलि का कार्य करते हैं। दुआरी मंदिर के द्वार खोलने और बंद करने की जिम्मेदारी संभालते हैं।
वहीं, पनेरी समूह भोग बनाने और देवी के पीठस्थान की सफाई के लिए जल उपलब्ध कराता है।
📡 स्रोत: NewsData.io