कांग्रेस छोड़कर BJP में गए नेताओं पर राहुल गांधी का तंज, बोले- 'वो लोग अब...'
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चुनाव आयोग के मुद्दे पर प्रदर्शनों के बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सेवादल, यूथ कांग्रेस और NSUI के कार्यकर्ताओं के साथ चाय पर चर्चा की.
बैठक में बीजेपी के खिलाफ लड़ाई, कांग्रेस छोड़कर दूसरे दलों में गए नेताओं, विपक्षी एकजुटता और पार्टी में धैर्य बनाए रखने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई.
चाय पार्टी में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए नेताओं का मुद्दा भी उठा.
सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी ने ऐसे नेताओं पर तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने वाले कई नेता अब पछता रहे हैं. वो लोग भी बदलता हुआ राजनीतिक माहौल देख रहे हैं.
'राजनीति में कोई ऐसा दोस्त नहीं होता है'
इसी दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने हंसते हुए राहुल गांधी से कहा कि वे नेता भी तो आपके बेस्ट फ्रेंड थे.
खरगे की इस टिप्पणी पर राहुल गांधी मुस्कुराए और जवाब दिया, 'राजनीति में कोई ऐसा दोस्त नहीं होता है.'
बैठक में हुई इस हल्की-फुल्की बातचीत के बीच राजनीतिक रिश्तों और दल बदलने वाले नेताओं को लेकर भी संदेश देने की कोशिश दिखाई दी.
मायावती, ममता बनर्जी और शरद पवार का जिक्र
सूत्रों के अनुसार बैठक में विपक्षी एकजुटता और बीजेपी के खिलाफ राजनीतिक रणनीति पर भी चर्चा हुई.
इस दौरान बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और शरद पवार का जिक्र हुआ.
राहुल गांधी ने कहा कि बीजेपी से मुकाबला करना है तो इन नेताओं को कांग्रेस के साथ मिलकर चलना होगा.
बैठक में मायावती को लेकर भी राहुल गांधी की टिप्पणी सामने आई.
सूत्रों के मुताबिक उन्होंने कहा कि बीजेपी सीधे तौर पर मायावती पर हमला करने से बचती है.
इस चर्चा को विपक्षी दलों के बीच बेहतर तालमेल और बीजेपी के खिलाफ साझा राजनीतिक रणनीति बनाने की जरूरत से जोड़कर देखा जा रहा है.
खरगे के संघर्ष और धैर्य का जिक्र
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📡 स्रोत: ABP Live
💡 पृष्ठभूमि (Background)
इस खबर में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए नेताओं पर राहुल गांधी का तंज और उनकी चाय बैठक की चर्चा है। यह विषय भारतीय राजनीति में पार्टी बदलने की प्रवृत्ति और विपक्षी एकजुटता पर प्रकाश डालता है। यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि कैसे प्रमुख नेता अपने निर्णयों पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करते हैं, जिससे जनता में राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। आम जनता पर इसका असर यह हो सकता है कि मतदाता अपनी निष्ठा पर पुनर्विचार करें, और राजनीतिक दलों को अपने आंतरिक संघर्षों को सुलझान