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कॉर्पोरेट अपराध पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला:व्यक्ति आरोपी न हो, तब भी कंपनी पर चलेगा मुकदमा; जेल की जगह जुर्माना देना होगा

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 8 सितंबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
कॉर्पोरेट अपराध पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला:व्यक्ति आरोपी न हो, तब भी कंपनी पर चलेगा मुकदमा; जेल की जगह जुर्माना देना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कंपनियों के खिलाफ आपराधिक मामलों को लेकर बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ इसलिए किसी कंपनी के खिलाफ केस खत्म नहीं किया जा सकता कि जिस कर्मचारी या अधिकारी के जरिए अपराध हुआ, उसकी पहचान नहीं हो पाई या उसे आरोपी नहीं बनाया गया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने सुनवाई के बाद फार्मा कंपनी सनोफी इंडिया लिमिटेड की अपील खारिज कर दी।

यह मामला दवा बनाने वाली कंपनी सनोफी इंडिया लिमिटेड से जुड़ा है। कंपनी के खिलाफ सीबीआई ने मामला दर्ज किया था। कंपनी ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही खत्म करने से इनकार किया गया था। दवा खरीद से जुड़ा है मामला, फायदे के लिए रिश्वत देने का आरोप यह मामला BARC के लिए दवाओं की खरीद से जुड़ा CBI केस है।

चार्जशीट में आरोप लगाया गया था कि BARC के एक अधिकारी ने सनोफी इंडिया के साथ मिलकर महंगी दरों पर दवाएं खरीदीं और गलत फायदा पहुंचाने के बदले रिश्वत दी गई। सनोफी इंडिया एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी है, जिसका मुख्य कारोबार दवाओं का निर्माण है। इस मामले में कंपनी के साथ उसका कोई कर्मचारी या अधिकारी आरोपी नहीं बनाया गया था।

कंपनी ने दलील दी थी कि उसके खिलाफ मुकदमा चलाया ही नहीं जा सकता, क्योंकि उस पर आपराधिक मंशा यानी मेंस रिया नहीं थोपी जा सकती। कंपनी ने यह भी कहा था कि दोषी पाए जाने पर उसे जेल नहीं भेजा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने 98 पेज का फैसला लिखा जस्टिस जेबी पारदीवाला ने 98 पन्नों का फैसला लिखा। बेंच ने कॉर्पोरेट आपराधिक जिम्मेदारी के नियमों और किसी व्यक्ति के कृत्य व आपराधिक मंशा को कंपनी से जोड़ने के सिद्धांतों की विस्तार से जांच की।

बेंच के सामने यह सवाल था कि क्या हाईकोर्ट को इस आधार पर कंपनी के खिलाफ शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही खत्म कर देनी चाहिए थी कि उसके साथ किसी प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान नहीं हुई और उसे आरोपी नहीं बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कंपनी में "मेंस रिया" किसी जीवित व्यक्ति के कृत्य और मंशा को कंपनी से जोड़कर ही मानी जा सकती है।

लेकिन कार्यवाही खत्म करने की मांग पर सुनवाई के चरण में किसी खास व्यक्ति की पहचान न होना अपने आप में अभियोजन के लिए घातक नहीं है। कोर्ट ने कहा, “भारतीय कानून के तहत स्थिति साफ है। किसी कंपनी पर ऐस

📡 स्रोत: Dainik Bhaskar

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