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केरल हाईकोर्ट बोला-महिला की छाती पर कोहनी मारना छेड़छाड़ नहीं:कहा- यह हरकत गरिमा भंग करने का इरादा साबित नहीं करती; मजिस्ट्रेट कोर्ट का फैसला पलटा

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 10 अक्टूबर 2026 👁️ 3 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: जनता का संदेश
केरल हाईकोर्ट बोला-महिला की छाती पर कोहनी मारना छेड़छाड़ नहीं:कहा- यह हरकत गरिमा भंग करने का इरादा साबित नहीं करती; मजिस्ट्रेट कोर्ट का फैसला पलटा

केरल हाईकोर्ट ने महिला की छाती पर कोहनी मारने के मामले में एक व्यक्ति को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इससे महिला की गरिमा भंग करने का इरादा साबित नहीं होता। जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने क्रिमिनल रिव्यू पिटीशन मंजूर की। उन्होंने चालक्कुडी की ज्यूडिशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट कोर्ट-I की सजा रद्द कर दी।

इस सजा को त्रिशूर की एडिशनल सेशंस कोर्ट-III ने भी बरकरार रखा था। मामला IPC की धारा 354 के तहत दर्ज था। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने आरोपी को एक महीने की कैद और ₹1000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके बाद अपीलीय अदालत ने भी दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी थी। मामले से जुड़े तीन पक्ष… पीड़ित का पक्ष आरोपी का पक्ष सरकार का पक्ष हाईकोर्ट ने कहा- इरादा व्यक्ति के मन की स्थिति हाईकोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 354 लगाने के लिए महिला की गरिमा भंग करने का इरादा साबित होना जरूरी है।

कोर्ट ने कहा कि घटना की प्रकृति और परिस्थितियों की बारीकी से जांच करनी होगी। इससे आरोपी के इरादे का पता लगाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा, “इरादा व्यक्ति के मन की स्थिति होता है। आमतौर पर इसे सीधे सबूत से साबित नहीं किया जा सकता। किसी काम के पीछे का इरादा जानने के लिए अदालत व्यक्ति के मन में नहीं झांक सकती।” कोर्ट ने कहा कि आरोपी पर लगाया गया खास आरोप महिला की छाती पर कोहनी से मारने का है।

मामले में सामने आई परिस्थितियों के आधार पर इस काम से आपराधिक इरादा साबित नहीं होता। अदालत ने कहा, “मामले में आरोपी पर लगाया गया खास आरोप यह है कि उसने शिकायतकर्ता की छाती पर कोहनी से वार किया। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसे काम से महिला की गरिमा भंग करने का आपराधिक इरादा कैसे माना जा सकता है।” कोर्ट ने आगे कहा, “इसलिए मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि IPC की धारा 354 का अपराध बनाने के लिए जरूरी आपराधिक इरादा इस मामले में मौजूद नहीं है।” सबूतों की भी जांच की हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि के आधार की भी जांच की।

कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मुख्य रूप से महिला और उसकी मां की गवाही पर भरोसा किया था। अपीलीय अदालत ने भी इन्हीं दोनों के बयानों के आधार पर दोषसिद्धि बरकरार रखी थी। कोर्ट ने कहा कि महिला के पति के खिलाफ आरोपी की शिकायत पर दर्ज मामला पहले से लंबित था। इससे महिला को झूठा फंसाए जाने की संभावना पैदा होती है।

ऐसी स्थिति में महिला की गवाही की ज्या

📡 स्रोत: Dainik Bhaskar

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💡 पृष्ठभूमि (Background)

केरल हाईकोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाया जिसमें एक पुरुष पर महिला की छाती पर कोहनी मारने का आरोप था। न्यायाधीश ने पाया कि यह कार्य गरिमा भंग करने का इरादा नहीं दर्शाता, इसलिए आरोपी को बरी कर दिया गया। यह निर्णय इस बात पर प्रकाश डालता है कि शारीरिक संपर्क के प्रति कानूनी मानदंड कैसे लागू होते हैं। खबर का महत्व इसलिए है क्योंकि यह लैंगिक हिंसा के प्रति समाज की धारणा और न्यायिक दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकता है। आम जनता पर इसका असर यह हो सकता है कि लोग अपनी सहमति और सीमाओं के प्रति अधिक सतर्क रहें

🎙️ जनता का संदेश का मत

इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि हिंसा का सामना करते समय कानूनी मार्ग सबसे विश्वसनीय विकल्प है। समाज को चाहिए कि वे ऐसे घटनाओं पर सहानुभूति के साथ प्रतिक्रिया दें, पीड़ितों को समर्थन और संरक्षण प्रदान करें, और न्यायिक प्रक्रियाओं का सम्मान करें। केवल शारीरिक आक्रमण से नहीं, बल्कि संवाद, मध्यस्थता और कानूनी सहायता से संघर्षों का समाधान संभव है।

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