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कोल्हापुर की महालक्ष्मी- समृद्धि और शक्ति का रूप:पश्चिममुखी देवी का डूबते सूरज की किरणें करती हैं अभिषेक, दशहरे पर तिरुपति से आती है साड़ी

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 17 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
कोल्हापुर की महालक्ष्मी- समृद्धि और शक्ति का रूप:पश्चिममुखी देवी का डूबते सूरज की किरणें करती हैं अभिषेक, दशहरे पर तिरुपति से आती है साड़ी

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में देवी महालक्ष्मी की प्रतिमा पश्चिममुखी है। मंदिर की बनावट ऐसी है कि साल में दो बार डूबते सूरज की किरणें सीधे गर्भगृह तक पहुंचती हैं। पहले देवी के पैरों पर, फिर कमर और अंत में पूरी प्रतिमा पर प्रकाश पड़ता है। इसे किरणोत्सव कहते हैं। यहां देवी की मूल प्रतिमा काले पत्थर की है, जबकि पालकी में निकलने वाली उत्सव प्रतिमा तांबे, चांदी और पीतल से बनी है।

नवरात्रि में हर रात पालकी यात्रा होती है। पंचमी पर देवी अपनी सखी त्र्यंबोली से मिलने जाती हैं। वहां एक कन्या कद्दू फोड़कर राक्षस वध की प्रतीकात्मक रस्म निभाती है। मंदिर में सुबह देवी का मुखमार्जन होता है और रात को दूध-शक्कर का भोग लगाकर शयन सेवा दी जाती है। काले पत्थर की पश्चिममुखी प्रतिमा; मुकुट पर शिवलिंग, हाथों में फल, गदा, ढाल और पात्र गर्भगृह में देवी महालक्ष्मी की करीब तीन फीट ऊंची काले पत्थर की प्रतिमा है।

चार हाथों में म्हालुंग नाम का बड़ा नींबू जैसा फल, गदा, ढाल और पानपात्र है। मूर्ति के पीछे पत्थर का शेर बना है। देवी के मुकुट पर शिवलिंग है। उसके चारों ओर योनि का चिह्न और ऊपर नाग का फन है। देवी के इस स्वरूप के बारे में दुर्गा सप्तशती में लिखा है। गर्भगृह के दोनों ओर महाकाली और महासरस्वती के अलग मंदिर हैं।

मंदिर परिसर में मातुलिंग महादेव का भी पूजा स्थान है। मंदिर की पालकी यात्रा के लिए तीन धातुओं से बनी उत्सव प्रतिमा, करीब 250 साल पुरानी महालक्ष्मी की मूल प्रतिमा के अलावा एक मूर्ति और है, जिसे मंदिर से बाहर पालकी में ले जाते हैं। ये 12 इंच ऊंची और चार इंच चौड़ी उत्सव प्रतिमा है। इसमें देवी सिंह पर बैठी हैं।

मूर्ति का मुख्य हिस्सा तांबे का, चेहरा चांदी का और हथियार पीतल के हैं। पीछे की चौकी भी पीतल की है। इन सभी हिस्सों को बिना वेल्डिंग के जोड़ा गया है। देवी के पीछे नाग बना है। छत्रपति संभाजी द्वितीय के समय के बाद से इस उत्सव प्रतिमा का इस्तेमाल हो रहा है। ये परंपरा करीब 250 साल पुरानी मानी जाती है।

इस उत्सव प्रतिमा का अलग सिंहासन है। इसकी पूजा में स्नान और कुमकुम अर्चन होता है। इसे केवल मंदिर के पुजारी संभालते हैं। देवी अपनी सखी त्र्यंबोली से मिलने जाती हैं, कन्या से करवाते हैं राक्षस वध की रस्म नवरात्रि में ललिता पंचमी पर त्र्यंबोली यात्रा होती है। इस दिन देवी की पालकी टेंबलाई पहाड़ी पर त्र्यंबोली देवी मंदिर तक जाती है।

परंपरा में इन्हें महालक्ष्मी की सखी माना जाता है। कथा के अनुसार, कोल्हासुर के वध के बाद उसके वंशज कामाक्ष ने देवताओं को संकट में डाल दिया। त्र्यंबोली ने उसका अंत कर देवताओं को मुक्त कराया। लेकिन विजय उत्सव में देवता त्र्यंबोली का सम्मान करना भूल गए। इससे नाराज होकर वे पहाड़ी पर चली गईं।

उन्हें मनाने के लिए महालक्ष्मी स्वयं वहां जाती हैं। हर साल नवरात्रि की पंचमी पर महालक्ष्मी की पालकी त्र्यंबोली मंदिर पहुंचती है। वहां दोनों देवियों के मिलन की पूजा होती है। इसके बाद कुष्मांड भेदन की रस्म होती है। कुष्मांड यानी कद्दू। इसे राक्षस का प्रतीक मानकर फोड़ा जाता है। यह रस्म किसी छोटी कन्या से कराई जाती है।

अष्टमी की रात देवी शयन नहीं करतीं, रात में होता है विशेष हवन; नवमी पर कद्दू की बलि और शस्त्र पूजा महाअष्टमी: देवी को महिषासुर का वध करने वाले रूप में सजाया जाता है। रात करीब 9 बजे देवी लोगों को दर्शन देने के लिए नगर-भ्रमण पर निकलती है। मान्यता है कि कोल्हासुर के वध के बाद देवी ने नगरवासियों को निर्भय रहने का भरोसा दिया था।

इसी की याद में देवी शहरवासियों को दर्शन देने निकलती हैं। यात्रा में भवानी मंडप के मंदिर में तुलजा भवानी और महालक्ष्मी के मिलन की रस्म भी होती है। यात्रा से आने के बाद देवी की विशेष पूजा होती है। रोज होने वाली शेजारती यानी शयन आरती नहीं होती। इस तिथि पर देवी शयन नहीं करती। आधी रात में हवन शुरू होता है।

अगले दिन सुबह की काकड़ आरती भी नहीं होती। महानवमी: सुबह करीब 3 बजे सप्तशती पाठ के साथ तिल, चावल और घी की आहुतियां शुरू होती हैं। इसमें कद्दू की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है। अंतिम पूर्णाहुति और तोप की सलामी के साथ नवरात्रि का समापन होता है। इस दिन पारंपरिक शस्त्रों की पूजा भी होती है। 14वीं-15वीं सदी में मंदिर से हटाई प्रतिमा, 1715 में दशहरे पर दोबारा स्थापना हुई 14वीं-15वीं शताब्दी में मंदिर पर हुए हमलों के दौरान पुजारियों ने महालक्ष्मी की मूल प्रतिमा सुरक्षित रखने के लिए मंदिर से हटा दी थी।

इसे कपिलतीर्थ इलाके में एक पुजारी के घर छिपाया गया। कई पीढ़ियों बाद नरहर भट सावगांवकर ने छत्रपति संभाजी द्वितीय को प्रतिमा के बारे में बताया। स्थानीय मान्यता है कि सावगांवकर को सपने में देवी ने अपनी मूर्ति की जानकारी दी थी। छत्रपति ने सरदार सिदोजी हिंदुराव घोरपड़े को प्रतिमा वापस मंदिर में स्थापित कराने का आदेश दिया।

तब 26 सितंबर 1715 को दशहरे पर प्रतिमा की दोबारा स्थापना हुई। इसके बाद छत्रपति ने मंदिर की नियमित पूजा और उत्सवों के लिए जमीन भी दान की।

📡 स्रोत: NewsData.io

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