कोटा मेडिकल कॉलेज में सातवां देहदान
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कोटा मेडिकल कॉलेज में इस साल का सातवां देहदान हुआ है। रावतभाटा निवासी विनय कुमार जैन के निधन के बाद उनके परिजन जयपुर से पार्थिव देह लेकर कोटा पहुंचे और मेडिकल कॉलेज को सुपुर्द किया।
29 अक्टूबर,कोटा। देहदान को महादान कहा जाता है, क्योंकि इससे चिकित्सा शिक्षा और भविष्य के डॉक्टरों के प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण योगदान मिलता है। इसी भावना की एक मिसाल कोटा में देखने को मिली, जहां रावतभाटा निवासी विनय कुमार जैन के निधन के बाद उनके परिजनों ने उनकी पार्थिव देह मेडिकल कॉलेज को सुपुर्द की। विनय कुमार जैन ने अप्रैल 2013 में देहदान का संकल्प लिया था। उनके इस संकल्प को पूरा करने के लिए परिजन जयपुर से पार्थिव देह लेकर कोटा पहुंचे।
कोटा मेडिकल कॉलेज में इस वर्ष अब तक सात पार्थिव देह देहदान के माध्यम से प्राप्त हो चुकी हैं। वहीं, मेडिकल कॉलेज को अब तक कुल 72 पार्थिव देह प्राप्त होने की जानकारी दी गई है। इसके अलावा, सैकड़ों लोग देहदान का संकल्प भी ले चुके हैं।
जयपुर से कोटा पहुंचकर परिजनों ने पूरा किया संकल्प
रावतभाटा निवासी विनय कुमार जैन अपने बेटे के पास जयपुर में रह रहे थे। वहीं उनका निधन हो गया। इसके बाद परिजनों ने उनके पूर्व में लिए गए देहदान के संकल्प का सम्मान करते हुए पार्थिव देह को कोटा मेडिकल कॉलेज को सुपुर्द करने का निर्णय लिया।
परिजन पार्थिव देह को जयपुर से कोटा लेकर पहुंचे और मेडिकल कॉलेज को सौंप दिया। विनय कुमार जैन ने अप्रैल 2013 में देहदान का संकल्प लिया था। उनके निधन के बाद परिजनों द्वारा इस संकल्प को पूरा करना चिकित्सा शिक्षा के प्रति समर्पण और सामाजिक जिम्मेदारी का उदाहरण है।
मेडिकल विद्यार्थियों की पढ़ाई में मिलेगी मदद
मेडिकल कॉलेजों में विद्यार्थियों को मानव शरीर की संरचना और विभिन्न अंगों की बनावट को व्यावहारिक रूप से समझने के लिए पार्थिव देह की आवश्यकता होती है। देहदान के माध्यम से प्राप्त शरीर का उपयोग शरीर रचना विज्ञान की पढ़ाई और निर्धारित शैक्षणिक प्रक्रियाओं के तहत विद्यार्थियों के प्रशिक्षण में किया जाता है।
किताबों में मानव शरीर के अंगों और उनकी संरचना के बारे में पढ़ना महत्वपूर्ण है, लेकिन वास्तविक मानव शरीर के अध्ययन से विद्यार्थियों को शरीर की बनावट और अंगों के आपसी संबंधों को बेहतर ढंग से समझने का अवसर मिलता है। इससे भविष्य में डॉक्टर बनने वाले विद्यार्थियों की चिकित्सा संबंधी समझ विकसित होती है।
‘साइलेंट टीचर’ के रूप में महत्वपूर्ण है देहदान
चिकित्सा शिक्षा में दान की गई पार्थिव देह को ‘साइलेंट टीचर’ यानी मौन शिक्षक भी कहा जाता है। इसके माध्यम से मेडिकल विद्यार्थी मानव शरीर की वास्तविक संरचना का अध्ययन करते हैं और चिकित्सा विज्ञान की बुनियादी जानकारी प्राप्त करते हैं।
देहदान चिकित्सा शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध कराने के साथ समाज के प्रति योगदान का भी माध्यम है। इससे आने वाली पीढ़ियों के डॉक्टरों को सीखने और अपने व्यावहारिक ज्ञान को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।
कोटा मेडिकल कॉलेज को अब तक मिलीं 72 पार्थिव देह
कोटा मेडिकल कॉलेज में इस वर्ष अब तक सात देहदान हो चुके हैं। वहीं, कॉलेज को अब तक कुल 72 पार्थिव देह प्राप्त होने की जानकारी सामने आई है। इसके अलावा, सैकड़ों लोग देहदान का संकल्प ले चुके हैं।
देहदान के प्रति बढ़ती जागरूकता चिकित्सा शिक्षा के लिए सकारात्मक संकेत है। हालांकि, देहदान का संकल्प लेने के साथ-साथ परिजनों को इसकी जानकारी देना और संबंधित मेडिकल कॉलेज की निर्धारित प्रक्रिया से परिचित रहना भी महत्वपूर्ण है, ताकि जरूरत पड़ने पर संकल्प को पूरा किया जा सके।
परिजनों ने दिया समाज को प्रेरक संदेश विनय कुमार जैन के निधन के बाद उनके परिजनों द्वारा देहदान के संकल्प को पूरा करना समाज के लिए प्रेरणादायक है। यह कदम दर्शाता है कि किसी व्यक्ति के जाने के बाद भी उसका योगदान चिकित्सा शिक्षा के माध्यम से लंबे समय तक बना रह सकता है।
कोटा मेडिकल कॉलेज में हुए इस देहदान से मेडिकल विद्यार्थियों को अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध हुआ है। देहदान के प्रति जागरूकता बढ़ने से चिकित्सा शिक्षा को मजबूती मिल सकती है और समाज में इस मानवीय पहल को प्रोत्साहन मिल सकता है।
पंकज जैन, पुत्र।
डॉ. प्रतिमा जायसवाल, वरिष्ठ आचार्य, शरीर रचना विभाग।
अशोक जैन, पुत्र।