विदेश

माता सती, भगवान शिव और प्रजापति दक्ष की कथा:सीख- रिश्तों में पद, प्रतिष्ठा और सफलता का अहंकार नहीं होना चाहिए; 5 बातें ध्यान रखें, वर्ना रिश्ते बिगड़ जाते हैं

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 15 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
माता सती, भगवान शिव और प्रजापति दक्ष की कथा:सीख- रिश्तों में पद, प्रतिष्ठा और सफलता का अहंकार नहीं होना चाहिए; 5 बातें ध्यान रखें, वर्ना रिश्ते बिगड़ जाते हैं

आज (15 अक्टूबर) नवरात्रि का पांचवां दिन है। देवी पूजा के इस उत्सव में शक्तिपीठों के दर्शन करने की परंपरा है। शास्त्रों में कुल 51 शक्तिपीठ बताए गए हैं। ये सभी मंदिर देवी सती से संबंधित हैं। पढ़िए शक्तिपीठों की उत्पत्ति से जुड़ी यह कथा और कथा का संदेश...

मां सती, भगवान शिव और प्रजापति दक्ष से जुड़ी कथा हमें बताती है कि अहंकार, अपमान और मोह के कारण रिश्तों में तनाव बढ़ जाता है। आपसी रिश्तों इन बुराइयों से बचना चाहिए। पौराणिक कथा है कि मां सती का विवाह भगवान शिव से हुआ था। सती के पिता प्रजापति दक्ष को भगवान शिव पसंद नहीं थे। एक बार दक्ष ने भव्य यज्ञ का आयोजन किया और सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन अपनी पुत्री सती और भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया।

जब नारद जी से सती माता को इस यज्ञ के बारे में पता चला, तो उन्होंने भगवान शिव को वहां जाने की इच्छा जताई। भगवान शिव ने देवी को समझाया कि बिना निमंत्रण हमें ऐसे आयोजन में नहीं जाना चाहिए, लेकिन जिद करके माता सती पिता दक्ष के यज्ञ में चली गईं। यज्ञ स्थल पर पहुंचकर माता सती ने देखा कि वहां सभी का सम्मान हो रहा है, पर उनके पति शिव का अपमान किया जा रहा है।

पिता से इसका कारण पूछने पर दक्ष ने शिव के प्रति अपमानजनक बातें कहीं। अपने पति का अपमान सहन न कर पाने के कारण सती ने यज्ञ कुंड में अपनी देह त्याग दी। जब भगवान शिव को इस घटना का समाचार मिला, तो वे अत्यंत क्रोधित और दुखी हो गए। उनके गण वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया और दक्ष का सिर काट दिया।

बाद में भगवान शिव ने दक्ष को जीवनदान दिया था। सती के वियोग में भगवान शिव देवी का शरीर लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे। उनका दुख और मोह देखकर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती की देह के अंग अलग कर दिए। मान्यता है कि जहां-जहां देवी सती के अंग गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए। परंपरागत रूप से 51 शक्तिपीठ माने जाते हैं।

बाद में मां सती ने पार्वती के रूप में जन्म लिया और फिर भगवान शिव से देवी का पुनः विवाह हुआ। कथा की सीख 1.

रिश्तों में अहंकार से बचें प्रजापति दक्ष का अहंकार रिश्तों पर भारी पड़ा। जीवन में पद, प्रतिष्ठा और सफलता महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके कारण किसी का अपमान करना उचित नहीं है। रिश्ते अहंकार से नहीं, सम्मान और विनम्रता से मजबूत होते हैं। किसी भी विवाद में अपनी प्रतिष्ठा बचाने से पहले रिश्ते की गरिमा को महत्व दें। 2.

घर-परिवार में अपमान का जवाब क्रोध से न दें कथा में माता सती के सामने शिव जी के अपमान के कारण बड़ी घटना घटित हुई। गुस्से में लिया गया निर्णय समस्या को बढ़ा सकता है। जब कोई आपको ठेस पहुंचाए, तो तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ समय रुकें। शांत मन से अपनी बात कहें और जरूरत पड़ने पर उस परिस्थिति से, उस जगह से दूरी बना लें। 3.

भावनाओं के साथ समझदारी का संतुलन बनाए रखें सती का अपने पति के प्रति प्रेम गहरा था, लेकिन यह प्रसंग हमें यह भी प्रेरणा देता है कि कठिन परिस्थितियों में भावनाओं के साथ समझदारी बनाए रखनी चाहिए। किसी भी निर्णय से पहले उसके परिणामों पर विचार करें। भावनाएं हमें दिशा देती हैं, जबकि समझदारी सही रास्ता चुनने में मदद करती है। 4.

बिन बुलाए किसी के यहां मांगलिक आयोजन में जाने से बचना चाहिए सती बिना निमंत्रण पिता के यज्ञ में पहुंची थीं और इसके बाद यज्ञ और रिश्ते सब बर्बाद हो गए। हमारे लिए हर कार्यक्रम, बहस या विवाद में शामिल होना आवश्यक नहीं है। अपनी ऊर्जा उन लोगों और कार्यों पर लगाएं, जो आपकी शांति, विकास और खुशियों के लिए उपयोगी हैं। 5.

क्षमा करने की क्षमता विकसित करें भगवान शिव ने अंततः दक्ष को क्षमा करके जीवनदान दिया था। यह प्रसंग क्षमा करने का संदेश देता है। क्षमा का अर्थ गलत व्यवहार को स्वीकार करना नहीं, बल्कि मन में पल रहे क्रोध के बोझ को कम करना है। रिश्तों में अगर कोई गलती करता है, तो उसे क्षमा करने से बात ज्यादा बढ़ती नहीं है।

📡 स्रोत: NewsData.io

📰 पूरी खबर पढ़ें (NewsData.io पर जाएं)
J
JKS News Desk

जनता का संदेश की संपादकीय टीम आपके लिए भोपाल, मध्यप्रदेश और देश की सटीक और विश्वसनीय समाचार प्रस्तुत करती है।