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पुरखों से मिले देसी बीजों को सहेजकर रख रहीं बिरमतिया बैगा

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 27 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
पुरखों से मिले देसी बीजों को सहेजकर रख रहीं बिरमतिया बैगा

बिरमतिया बैगा के खेतों में समा, कुटकी, सिकिया, काकुन, सरैय्या और ठर्री धान जैसी पारंपरिक फसलें उगाई जाती हैं। अलग-अलग मौसम में इन फसलों की खेती करना और उनसे प्राप्त अनाज को सुरक्षित रखना उनके परिवार की पुरानी परंपरा का हिस्सा है। उनके लिए खेत में उगने वाला प्रत्येक अनाज केवल उपज नहीं है। उसके साथ परिवार की यादें, पूर्वजों की खेती की पद्धति और वर्षों से चली आ रही खाद्य परंपरा जुड़ी हुई है। वे पुराने बीजों को संभालकर रखती हैं, ताकि अगली फसल के समय उन्हीं बीजों को फिर से खेत में बोया जा सके।

बिरमतिया बैगा के परिवार में खेत से प्राप्त अनाज का उपयोग भोजन के लिए किया जाता है। समा, कुटकी, सिकिया और काकुन जैसे अनाज उनके पारंपरिक खानपान का हिस्सा हैं। वहीं सरैय्या और ठर्री जैसी धान की किस्में उनकी खेती में विविधता बनाए रखती हैं। उनके यहां बीज संरक्षण की परंपरा एक मौसम की फसल के साथ समाप्त नहीं होती। फसल तैयार होने के बाद उसके अनाज का उपयोग किया जाता है और अगले मौसम की बुवाई के लिए बीज सुरक्षित रखे जाते हैं। इस तरह पुरानी किस्में एक फसल से दूसरी फसल और एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक पहुंचती रहती हैं।

💡 पृष्ठभूमि (Background)

बिरमतिया बैगा की परिवारिक परंपरा में पुरखों से मिले देसी बीजों को सुरक्षित रखकर खेती करना एक अनूठा विषय है। यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के तेज़ी से बदलते कृषि परिदृश्य में, ऐसी प्राचीन पद्धतियाँ जैव विविधता और खाद्य सुरक्षा के लिए एक वैकल्पिक मार्ग दर्शाती हैं। यदि इस प्रकार की परंपरा व्यापक रूप से अपनाई जाए, तो आम जनता को अधिक पोषक, रोग प्रतिरोधी अनाज मिल सकते हैं और स्थानीय किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जा सकता है, जिससे ग्रामीण समाज में स्थायी विकास की दिशा खुल सकती है।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan जनता का संदेश के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।