रामकथा : भाग-5; कृत्तिवास रामायण:जिस बाण से रावण की मृत्यु हो सकती थी, उसे मन्दोदरी ने कहीं छिपा दिया था, हनुमान जी ने कैसे खोजा वह बाण
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →भास्कर सीरीज; 7 दिन... 7 रामायण, अपनी-अपनी रामकथा : भाग-5 में पढ़िए- कृत्तिवास रामायण। इसकी रचना बंगाल के प्रसिद्ध कवि कृत्तिवास ओझा ने 15वीं सदी में की थी। यह बांग्ला भाषा में रचित स्वतंत्र काव्य-कृति है, जिसने बंगाल के जन-जीवन व संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला। प्रसंग-1: श्रीराम ने की दुर्गा स्तुति रावण का वध न हो पाने से जब श्रीराम बहुत निराश हो गए तो ब्रह्माजी ने कहा- हे प्रभु!
आप देवी माहेश्वरी का पूजन करें, तभी रावण का संहार हो सकेगा। श्रीराम ने कहा- इस पूजा के लिए वसन्त ही एकमात्र शुभ समय है। शरद असमय है। ब्रह्माजी ने कहा, आप षष्ठी-कल्प पर बोधन करें। विधि का खंडन कर राजा सुरथ ने कल्प-खंड आरंभ किया था। श्रीराम ने स्नान और दान किया। वन-पुष्प और फूल-मूल से सागर के तट पर जाकर उन्होंने कल्प किया।
रघुपति ने दुर्गा की पूजा की। चंडीपाठ करने के बाद राम ने उत्सव किया। (यही प्रसंग बाद में बांग्ला संस्कृति के सबसे बड़े पर्व 'दुर्गा पूजा' और सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की प्रसिद्ध कविता 'राम की शक्तिपूजा' का आधार बना)। (लंकाकांड 538-543वें छंद से) प्रसंग-2: विभीषण ने बताया था 'राज' युद्ध में विभीषण ने श्रीराम को बताया कि ब्रह्माजी द्वारा रावण को दिया वरदान स्मरण हो आया है।
उन्होंने कहा था- हे रावण !
तुम्हारी नाभि में ब्रह्मास्त्र प्रविष्ट होगा, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी। तुम्हारी मृत्यु का यह अस्त्र तुम्हारे ही घर पर रहेगा। मैंने उस ब्रह्म बाण का निर्माण किया है। विभीषण ने बताया कि उस अस्त्र को मन्दोदरी ने कहीं रखा है। मन्दोदरी के अन्तःपुर में तो वायु भी नहीं जा सकती?
तभी हनुमान जी ने कहा- मैं जाऊंगा। वे वृद्ध ब्राह्मण का भेष धरकर मन्दोदरी के पास पहुंचे और कहा- तुम्हारे घर में जो धन है, उसके प्रभाव से राम कभी रावण का वध नहीं कर पाएंगे। मन्दोदरी यह सुन चौंकी और बता दिया कि उसे खंभे के भीतर चुनवा रखा है। तभी हनुमान जी ने उस खंभे में लात मारी और बाण लेकर उड़ गए।
(लंकाकांड के 559-563वें छंद से) प्रसंग-3: विभीषण का पुत्र युद्ध में उतरा जब रावण के कई वीर युद्ध में मारे गए, तो उसे विभीषण के पुत्र तरणीसेन की याद आई। रावण ने उससे कहा- तुम्हारे पिता शत्रु के पक्ष में चले गए हैं, लेकिन तुम उनके जैसे नहीं हो। जाओ और राम, लक्ष्मण को हाथ-पैरों से बांधकर ले आओ।
तरणीसेन ने कहा- 'मैं अपने पिता के बारे में कुछ भी नहीं कहूंगा, क्योंकि कहते हैं कि युद्ध के समय श्रेष्ठ और ज्येष्ठ के गुण-दोष पर चर्चा नहीं करनी चाहिए। जाने से पहले उसने मां सरमा से कहा, राम के दर्शन से यह शरीर पवित्र हो जाएगा। पिता के चरण-कमल भी देख सकूंगा, मुझे आज्ञा दें। ' युद्ध में उसने लक्ष्मण, हनुमान और अंगद को भी छका दिया।
श्रीराम के बाण से वीरगति को प्राप्त हुआ। (लंकाकांड के 280-285वें छंद से) प्रसंग-4: जब लक्ष्मण ने धनुष से सेतु तोड़ा युद्ध के बाद जब श्रीराम और सीता पुष्पक विमान से वापस लौट रहे थे, तो राम उन्हें बता रहे थे कि कहां किस राक्षस का वध किया। इसी दौरान, उन्होंने वो सेतु भी दिखाया, जिससे वे लंका पहुंचे थे।
इसे देख सीता ने कहा- 'बिना अपराध के ही आपने सागर को बांध रखा है। इस सेतु से होकर यदि राक्षस समुद्र पार चले गए तो संसार में कोई जीव नहीं बचेगा। ' उनकी ये बातें सागर देव ने सुन लीं और हाथ जोड़कर प्रकट हो गए। उन्होंने कहा- यदि आपने मुझे इस बंधन से मुक्त न किया तो तीन युग में कौन ऐसा आएगा, जो मुझे इससे मुक्त करेगा।
श्रीराम ने लक्ष्मण की ओर देखा। लक्ष्मण धनुष लेकर सेतु पर उतर गए। धनुष के सिरे से उन्होंने तीन पत्थर खिसका दिए और दस योजन का एक रास्ता बन गया। सेतु टूट गया और तेज धार से पानी बह निकला। लक्ष्मण फिर विमान पर सवार हो गए। (लंकाकांड के 664, 665वें छंद से) रामकथा के पिछले भाग पढ़ने के लिए नीचे रिलेटेड आर्टिकल में दी गई लिंक पर क्लिक करें…
📡 स्रोत: NewsData.io
🎙️ जनता का संदेश का मत
रामकथा के इस भाग में दिखाया गया है कि कैसे एक छिपा हुआ बाण भी संघर्षों का समाधान कर सकता है। यह हमें सिखाता है कि जब भी किसी विवाद या गलतफहमी का सामना हो, तो शांत मन से समाधान खोजें, संवाद को प्राथमिकता दें और सहानुभूति दिखाएँ। केवल हिंसा से ही नहीं, बल्कि समझदारी और संयम से ही समाज में शांति और समृद्धि की नींव रखी जा सकती है।