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रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:जब कहा गया था, कभी नहीं चलेगी ‘कभी-कभी’!

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 13 सितंबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
रसरंग में मेरे हिस्से के किस्से:जब कहा गया था, कभी नहीं चलेगी ‘कभी-कभी’!

पिछले हफ्ते जब मैंने यश चोपड़ा जी के ऊपर अपना कॉलम लिखा तो यश जी की बनाई फिल्मों में मेरी सबसे फेवरेट फिल्म, जिसने मुझे रोमांस और ड्रामा तथा फिल्में लिखने के लिए प्रेरित किया, वह थी ‘कभी-कभी’। और मैं इसके स्क्रीनप्ले राइटर सागर सरहदी साहब का फैन हो गया। फिर ‘सिलसिला’ देखी तो सागर साहब का और भी मुरीद हो गया।

और मेरी खुशकिस्मती देखिए कि मुझे उनके साथ काम करने का मौका भी मिला। मेरी फिल्म ‘रंग’ में मैंने किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से डायलॉग नहीं लिखने का फैसला लिया तो प्रोड्यूसर-डायरेक्टर ने मुझसे कहा, "फिर तुम बताओ कि डायलॉग किससे लिखवाएं, क्योंकि स्क्रिप्ट तुम्हारी है।’ तो मैंने कहा, "जिस तरह की कहानी है, इसमें सागर सरहदी साहब चार चांद लगा देंगे।

वे बहुत अच्छे डायलॉग लिखेंगे।’ सागर सरहदी साहब से कॉन्टैक्ट किया गया, उनको बुलाया गया। मैंने उनको स्क्रिप्ट सुनाई और उन्होंने ‘रंग’ के डायलॉग लिखे। ‘रंग’ की राइटिंग के दौरान उनसे बात करने का, उनको समझने का और उनके किस्से सुनने का मौका मिला। सागर साहब ने अपनी निजी जिंदगी के बारे में भी बताया।

उनकी पैदाइश सूबा-ए-सरहद के गांव वफा में 11 मई 1935 को हुई थी, जो अब पाकिस्तान में है। हालांकि कुछ जगहों पर यह तिथि मई 1933 भी बताई गई है। परिजनों ने उनका नाम रखा था गंगासागर तलवार। उनके पिता का अफीम, चरस (जो उस समय कानूनी रूप से वैध थी) और शराब का बड़ा व्यापार था। खूब पैसे थे, शानदार घर था और जिंदगी बड़ी खुशहाल तथा अच्छी चल रही थी कि तभी हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा हो गया।

सागर साहब अपने परिवार के साथ ऐबटाबाद आ गए। वह थोड़ा बड़ा शहर था, फिर वहां भी कत्लेआम होने लगे तो उसे छोड़कर वे श्रीनगर आए और फिर श्रीनगर से जम्मू होते हुए दिल्ली आ गए। दिल्ली में वे रिफ्यूजी कैंप में रहने लगे। उन्होंने बताया कि वहां बहुत तकलीफ उठाई। न ढंग का खाना मिलता था, न टॉयलेट की सुविधा थी।

खैर, किसी तरह रहने का इंतजाम किया। उनके बड़े भाई ने घर को संभाला, काम शुरू किया और सागर साहब दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद मुंबई आ गए। यहां उन्होंने खालसा कॉलेज से ग्रेजुएशन किया, फिर पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज में एडमिशन लिया। लेकिन पोस्ट ग्रेजुएशन कर नहीं पाए।

उस साल वे फेल हो गए। फिर उनका आगे पढ़ने का मन ही नहीं किया। उन्हें लिखने का शौक था। कहानियां, नाटक लिखते। घर-खर्च चलाने के लिए उन्होंने एक ऐड कंपनी में नौकरी कर ली। चूंकि उनकी उर्दू अच्छी थी और वे उर्दू में ही लिखते-पढ़ते थे, इसलिए उस कंपनी में उन्हें आने वाले विज्ञापनों का उर्दू में अनुवाद करने का काम दिया गया।

इस बीच, उन्हें यह समझ में आ गया था कि इंग्लिश सीखना बहुत जरूरी है, क्योंकि इसके जरिए वे अंग्रेजी का सारा लिटरेचर पढ़ सकते थे। इसलिए उन्होंने इंग्लिश में भी पढ़ाई की और उर्दू के साथ-साथ उनकी इंग्लिश भी अच्छी हो गई। नौकरी से खर्चा तो चल रहा था, मगर ऑफिस आने-जाने और ट्रेन के सफर में ही उनके करीब 14-15 घंटे चले जाते थे।

इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी और सोचा कि फिल्मों में काम करके पैसे कमाएंगे, क्योंकि फिल्मों में पैसे ज्यादा हैं। बकौल सरहदी साहब, ‘उस समय प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन का दौर था। मैं भी मार्क्सिस्ट हो गया था और कैफी साहब, इस्मत चुगताई, जाफरी साहब जैसे बड़े मार्क्सिस्टों के साथ मेरा उठना-बैठना शुरू हो गया था।

मैं नाटक और कहानियां लिखने लगा, अफसाने लिखने लगा। प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की मीटिंगों में मैं अपने अफसाने सुनाता था। इप्टा के लिए प्ले लिखने लगा। मैंने हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे पर एक नाटक लिखा था, जिसका नाम था ‘मिर्जा साहिबां’। मेरा भतीजा रमेश तलवार यश चोपड़ा जी का चीफ असिस्टेंट था।

वह यश जी को नाटक दिखाने के लिए लेकर आया। नाटक देखकर यश जी बहुत इम्प्रेस हो गए। उन्होंने रमेश से कहा - तुम मुझे अपने चाचा से मिलवाओ।’ सरहदी साहब के मुताबिक, ‘मैं उनसे मिला और उन्होंने मुझे फिल्म लिखने का ऑफर दिया और इस तरह मेरी पहली फिल्म ‘कभी-कभी’ शुरू हुई। जब ‘कभी-कभी’ पूरी हो गई तो उसके डिस्ट्रीब्यूटर गुलशन राय जी ने फिल्म देखी और देखकर कहा, "यह फिल्म नहीं चलेगी।’ इस पर यश जी ने पूछा, "क्यों?

क्यों नहीं चलेगी?’ तो गुलशन जी बोले, "फिल्म की राइटिंग बहुत खराब है। बहुत किताबी है। सारे कैरेक्टर और डायलॉग फिलॉसॉफिकल और अदबी (साहित्यिक) जैसे दिखाई और सुनाई दे रहे हैं। फिल्म में थोड़ी बोलचाल और कैरेक्टर थोड़े रियल होने चाहिए। ये सब किताबी लग रहे हैं।’ मगर यश जी को फिर भी पूरा भरोसा था और उन्होंने किसी की नहीं सुनी। पिक्चर जैसी बनी थी, वैसी ही रिलीज की और वह सुपरहिट हुई। उसने गोल्डन जुबली मनाई। सबसे ज्यादा तारीफ फिल्म की राइटिंग की हुई और सागर सरहदी साहब को बेस्ट डायलॉग का फिल्मफेयर अवार्ड मिला। फिर तो ‘सिलसिला’, ‘नूरी’, ‘चांदनी’...

यानी सागर साहब के पास रोमांटिक फिल्मों की लाइन लग गई। सरहदी साहब की दास्तान लम्बी है। उन्होंने कैसे रोमांटिक फिल्मों के लेखक की अपनी छवि को तोड़ा, इसके बारे में अगले कॉलम में बात करेंगे। आज सरहदी जी की याद में उनकी फिल्म ‘कभी-कभी’ का ये गाना सुनिए, अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए: ‘कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है...’

📡 स्रोत: NewsData.io

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