राष्ट्र निर्माण की पीढ़ी तैयार करते हैं शिक्षक : राज्यपाल श्री पटेल
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राज्यपाल श्री पटेल ने कहा कि राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार- 2026 और गत वर्ष के राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से पुरस्कृत शिक्षकों के सम्मान का यह आयोजन, उन सभी शिक्षकों को नमन करने का प्रसंग है, जो ज्ञान और संस्कार से राष्ट्र का भविष्य गढ़ रहे हैं। माता-पिता तो केवल बच्चे को जन्म देते हैं, लेकिन शिक्षक बच्चे के व्यक्तित्व को दिशा देकर आदर्श नागरिक बनाने का महान कार्य करते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विजनरी नेतृत्व में देश ने नई सोच और नए कौशल के द्वारा शिक्षा को नये भारत की शक्ति बनाने का संकल्प, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के रूप में लिया है। शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षक, भारत को ज्ञान की महाशक्ति बनाने का संकल्प ग्रहण करें।
राज्यपाल श्री पटेल ने कहा कि आज की दुनिया में शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं रह सकती, उसे बदलती वैश्विक आवश्यकताओं और रोजगार के नए अवसरों के अनुरुप निरंतर अपडेशन, अपग्रेडेशन और इनोवेशन करते रहना होगा। समय की जरूरत है कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान और तकनीक से जोड़कर, हमारी शिक्षा को नई पहचान और शक्ति प्रदान करें।
कला, विज्ञान, खेल, कौशल और व्यावसायिक शिक्षा के बीच की दीवारें हटाते हुए, विद्यार्थियों को उनकी रुचि से विषय चुन कर पढ़ने का भरपूर अवसर दिया जाए। उन्होंने शिक्षकों का आह्वान किया कि आपको अब पाठ पढ़ाने से आगे बढ़कर, विद्यार्थियों की प्रतिभा को पहचान कर, उन्हें प्रेरित करने और सही दिशा देने वाले मार्गदर्शक के रूप में आगे आना होगा।
अध्यक्षीय संबोधन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि गुरु शिष्य परम्परा भारतीय संस्कृति की अनुपम धरोहर हैं। गुरुजन नि:संदेह विशेष भी हैं और हमारी प्राचीन सांस्कृतिक परम्पराओं का विशेषण भी। मुख्यमंत्री ने कहा कि दुनिया में देश का मान निरंतर बढ़ रहा है। इसके पीछे गुरु की महिमा है, क्योंकि जहां गुरूर खत्म होता है, और गुण शुरू होता है, वहीं गुरु की दृष्टि पैदा होती है।
गुरु की दृष्टि से ही शिक्षित समाज की सृष्टि होती है। उन्होंने कहा कि हमारे गुरुजन एक दीपक की तरह स्वयं अंधेरे में रहकर अपने विद्यार्थियों को शिक्षित कर उनका पूरा जीवन-चरित्र आलोकित करते हैं। इस दुनिया में माता-पिता के बाद वो शिक्षक ही हैं, जो यह कामना करते हैं कि आप वह बनें, जो आप वास्तव में बनना चाहते हैं।
आपको वह सब मिले, जो आप पाना चाहते हैं। इसीलिए गुरुजन सदैव वंदनीय हैं, पूजनीय हैं। इनका सदैव आदर-सम्मान और सत्कार करना हम सबका कर्तव्य है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने शिक्षकों के इस सम्मान समारोह में घोषणा करते हुए कहा कि प्रदेश के जिन वरिष्ठ शिक्षकों को टीईटी की परीक्षा देनी है और जिन्हें ऐसी ज़रूरत है, उन्हें ऑफलाइन टीईटी परीक्षा दिलाने के प्रयास और प्रबंध किए जाएंगे।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि भारत की गौरवशाली गुरुकुल और गुरु-शिष्य परंपरा दुनिया में सबसे प्राचीन है। भारत की मंशा कभी किसी देश को अधीन करने की नहीं रही। हम वसुधैब कुटुम्बकम की भावना से मानवता को बढ़ाने के लिए कार्य करते आए हैं। प्राचीन काल में भारत ने तक्षशिला, नालंदा विश्वविद्यालयों के माध्यम से दुनियाभर के विद्यार्थियों को शिक्षित किया।
वर्तमान समय में प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में भारत शांति और स्थिरता के साथ सुदृढ़ अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है और दुनिया भारत की ओर बड़ी आशा के साथ देख रही है। आजादी के बाद भारत ने गुट निरपेक्ष नीति अपनाई थी और वह समय आया है, जब प्रधानमंत्री श्री मोदी दुनिया के अलग-अलग शक्तिशाली देशों के राष्ट्राध्यक्षों से पूरे सम्मान के साथ मुलाकात और चर्चा करते हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि देश का नक्शा कागजों पर बनता है, लेकिन देश की किस्मत हमारे गुरुजन कक्षाओं में बनाते हैं। हमारे शिक्षक और गुरुजन इन कक्षाओं के अधिपति हैं। शिक्षक कई पीढ़ियों तक अपने शिष्य की प्रगति से आनंदित होता है। उसे जीवन में सबसे अधिक गर्व तब महसूस होता है, जब वो शिष्य को स्वयं से आगे बढ़ते हुए देखता है।
मध्यप्रदेश सरकार सभी शिक्षकों की मेहनत का सम्मान करती है। जब बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम सामने आते हैं तो इनकी मेरिट लिस्ट में 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे हमारे शासकीय स्कूलों के होते हैं, जो शिक्षकों के मार्गदर्शन और परिश्रम के कारण वहां तक पहुंच पाते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी सरकार शिक्षकों के लिए जो बेहतर हो सकता है, ऐसे सभी जरूरी निर्णय लेने के लिए प्रतिबद्ध है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हो रही टीईटी की परीक्षा ऑफलाइन मोड पर होगी। शिक्षा विभाग के आधार पर शैक्षणिक गुणवत्ता के लिए हम प्रयास कर रहे हैं। हमारे शासकीय स्कूल, प्राइवेट स्कूलों से बेहतर होंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश की धरती ऐसी है, जहां भगवान श्रीकृष्ण स्वयं शिक्षा ग्रहण करने के लिए उज्जैन के सांदीपनि आश्रम आए थे।
जहां उन्होंने 64 कलाएं और 14 विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया। श्रीकृष्ण के गुरु महर्षि सांदीपनि ने अपने शिष्य को जगद्गुरु की उपाधि दी। उन्होंने अपने शिष्य में भविष्य का पुरुषार्थ और पराक्रम देख लिया था। इसी प्रकार महर्षि विश्वामित्र ने बाल्यकाल में प्रभु श्रीराम और उनके भाइयों में पराक्रम देखा था।
वे राजा दशरथ से श्रीराम और लक्ष्मण को अपने साथ ले गए और श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बनाया।