सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत सभी प्रकार के तलाक संबंधी पक्षों से जवाब मांगा
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नई याचिका में तलाक-ए-हसन और एकतरफा गैर-न्यायिक तलाक के अन्य रूपों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। इसमें निष्पक्षता सुनिश्चित करने, सुलह को बढ़ावा देने और महिलाओं के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी दिशा-निर्देश बनाने का भी अनुरोध किया गया है।
याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ शरिया आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 को भी चुनौती दी गई है जो तलाक-ए-हसन को मान्यता देती है। याचिका में तलाकशुदा महिलाओं और उनके बच्चों की सुरक्षा के लिए आवश्यक उपाय करने की मांग की गई है।
तलाक-ए-हसन के अंतर्गत तीन महीने तक हर महीने एक बार तलाक कहा जाता है। यदि इस अवधि में पति-पत्नी के बीच साथ रहना फिर से शुरू नहीं होता, तो तीसरी बार तलाक कहे जाने के बाद तलाक की प्रक्रिया पूरी हो जाती है।
याचिका में मौजूदा पत्नी की स्वतंत्र और पूरी जानकारी के आधार पर दी गई सहमति के बिना बहुविवाह के खिलाफ सुरक्षा उपाय करने की भी मांग की गई है।
सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2017 में तत्काल तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।