शिवसेना चुनाव चिह्न विवाद, सुप्रीम कोर्ट बोला- दलबदल संवैधानिक पाप:चुनाव आयोग दोनों को अलग-अलग निशान दे सकता था; 4 साल से चल रहा विवाद
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सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना के चुनाव चिह्न विवाद पर सुनवाई की। कोर्ट ने पूछा कि दल-बदल करने वालों के लिए पार्टी के निशान की भावना कैसे लागू होगी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी.
मोहना की बेंच ने यह सवाल उठाया। बेंच एकनाथ शिंदे गुट को धनुष-बाण निशान देने के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई में शिंदे गुट के वकील नीरज किशन कौल ने दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग का विधायी बहुमत के आधार पर फैसला लेना कानूनी रूप से सही और प्रासंगिक था।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी पूछा था कि क्या चुनाव आयोग दोनों गुटों को आरक्षित धनुष-बाण निशान देने से इनकार कर सकता था। कोर्ट ने यह भी सवाल किया था कि जिन विधायकों की सदस्यता पर अयोग्यता की कार्यवाही चल रही हो, उनकी संख्या को बहुमत का सुरक्षित आधार माना जा सकता है या नहीं। जस्टिस बागची का सवाल जस्टिस बागची ने पूछा कि अगर अयोग्यता की कार्यवाही झेल रहे सदस्य बाद में अपनी सदस्यता खो देते हैं, तो पार्टी का चुनाव चिह्न कैसे काम करेगा।
उन्होंने कहा, “राजनीतिक दल के पास स्वतंत्रता रहती है। अगर अयोग्य सदस्य चले जाते हैं, तो बाकी सदस्यों को अलग चुनाव चिह्न मिल जाता है। आप अभी सादिक अली के फैसले को पढ़ने वाले थे।” इसके बाद जस्टिस बागची ने पूछा, “क्या चुनाव चिह्न की भावना उन लोगों के लिए लागू होगी, जिन्होंने संवैधानिक पाप किया है?
या उन लोगों के लिए, जिन्होंने संवैधानिक पाप की शिकायत की है?” उन्होंने संगठन के सदस्यों की संख्या के आधार पर जमीनी समर्थन तय करने पर भी सवाल उठाया। जस्टिस बागची ने कहा कि भारतीय राजनीति की उलझी हुई स्थिति में ऐसा करना मुश्किल हो सकता है। शिंदे गुट की दलील नीरज किशन कौल ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया।
उन्होंने चुनाव आयोग के विधायी बहुमत की कसौटी पर भरोसा करने का बचाव किया। कौल ने कहा कि चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश के तहत यह कसौटी तय करने में कानूनी रूप से सही और प्रासंगिक है कि कौन-सा गुट राजनीतिक दल है। कौल ने एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उसमें अयोग्यता का असर जरूरी तौर पर पहले की तारीख से लागू होने की बात नहीं कही गई थी।
उन्होंने कहा कि वह फैसला ऐसी स्थिति से जुड़ा था, जिसमें स्पीकर के अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने से पहले ही
📡 स्रोत: Dainik Bhaskar