श्योपुर में पराली प्रबंधन को लेकर जागरूकता शिविर, किसानों को पराली नहीं जलाने की दी सलाह
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श्योपुर जिले में पराली प्रबंधन को बढ़ावा देने और किसानों को फसल अवशेष नहीं जलाने के प्रति जागरूक करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। कलेक्टर शीला दाहिमा के निर्देश पर बगदिया, बनवाड़ा, ढेंगदा, लाडपुरा और बिचपुरी गांवों में जागरूकता शिविर आयोजित किए गए। इन शिविरों में दो सैकड़ा से अधिक किसानों ने हिस्सा लिया।
उप संचालक कृषि आरके सिंह ने बताया कि श्योपुर, कराहल और विजयपुर विकासखंड के गांवों में आयोजित शिविरों के दौरान कृषि अधिकारियों और विभिन्न विभागों के मैदानी अमले ने किसानों को पराली जलाने से होने वाले नुकसान की जानकारी दी। अधिकारियों ने बताया कि खेतों में पराली जलाने से मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों को नुकसान पहुंचता है और मृदा की उर्वरता प्रभावित होती है।
इसके अलावा, पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ता है। शिविरों में किसानों को पराली जलाने के बजाय फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करने के लिए प्रेरित किया गया। उन्हें सुपर सीडर, हैप्पी सीडर और स्ट्रॉ रीपर जैसे कृषि यंत्रों के उपयोग की जानकारी दी गई।
अधिकारियों ने बताया कि फसल अवशेषों को खेत में मिलाने से जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने और पोषक तत्वों के संरक्षण में मदद मिल सकती है। इससे खेती की लागत कम करने में भी सहायता मिल सकती है। कार्यक्रम के दौरान किसानों से पराली नहीं जलाने और अन्य किसानों को भी फसल अवशेष प्रबंधन के प्रति जागरूक करने की अपील की गई।
------ 5 लोअर हेडर
श्योपुर के पांच गांवों में पराली प्रबंधन जागरूकता शिविर आयोजित
दो सैकड़ा से अधिक किसानों ने शिविरों में लिया हिस्सा
पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण को नुकसान
सुपर सीडर और हैप्पी सीडर से फसल अवशेष प्रबंधन की जानकारी
किसानों से पराली नहीं जलाने और दूसरों को जागरूक करने की अपील
💡 पृष्ठभूमि (Background)
श्योपुर जिले में किसानों को फसल अवशेष जलाने से रोकने के लिए पराली प्रबंधन पर जागरूकता शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। यह पहल फसल अवशेष जलाने के हानिकारक प्रभावों को कम करने और पर्यावरणीय स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के उद्देश्य से है। यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि फसल अवशेष जलाने से हवा में हानिकारक धुआँ और धूल निकलती है, जिससे श्वसन रोगों का खतरा बढ़ता है और जलवायु परिवर्तन में योगदान होता है। आम जनता पर इसका असर सकारात्मक होगा: किसानों को वैकल्पिक निपटान विधियाँ सीखने को मिलेंगी, वायु गुणवत्ता सुधरेगी