इतिहास

सुल्तान जलालुद्दीन ख्वारिज़्म शाह: वो मुसलमान बादशाह जो मंगोलों के सामने चट्टान बन गया

लेखक: Maroof Ahmed Khan अंतिम अपडेट: 14 अगस्त 2026 👁️ 26 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: जनता का संदेश
सुल्तान जलालुद्दीन ख्वारिज़्म  शाह: वो मुसलमान बादशाह जो मंगोलों के सामने चट्टान बन गया

इतिहास में कुछ लोग अपनी सल्तनत की वजह से मशहूर होते हैं, और कुछ अपने हौसले की वजह से। सुल्तान जलालुद्दीन मंगबरनी उन्हीं लोगों में से एक थे। जब चंगेज़ ख़ान का नाम सुनकर बड़े-बड़े बादशाह हथियार डाल रहे थे, तब एक नौजवान मुसलमान सुल्तान ने दुनिया के सबसे ख़ौफ़नाक फ़तह करने वाले के सामने डटकर खड़े होने का फैसला किया।

जब जलालुद्दीन ने ख़्वारज़्म सल्तनत की कमान संभाली, तब तक सब कुछ लगभग तबाह हो चुका था। उनके वालिद की सल्तनत बिखर चुकी थी, शहर जल चुके थे और मंगोल फौजें हर तरफ़ मौत और तबाही फैला रही थीं। ऐसे हालात में ज़्यादातर हुक्मरान समझौता कर लेते, लेकिन जलालुद्दीन ने तलवार उठाने का रास्ता चुना। उन्होंने अफ़ग़ान, तुर्क और ख़्वारज़्मी लड़ाकों को एकजुट किया और मंगोलों के मुक़ाबले की तैयारी शुरू कर दी।

1221 में परवान की जंग ने इतिहास बदल दिया। चंगेज़ ख़ान ने अपने भरोसेमंद सेनापति शिगी कुतुकू को बड़ी फ़ौज के साथ भेजा। जलालुद्दीन ने खुली ज़मीन पर नहीं, बल्कि एक संकरी और पथरीली घाटी को जंग के लिए चुना, जहाँ मंगोलों की सबसे बड़ी ताक़त—घुड़सवार सेना—बेअसर हो गई। उन्होंने अपने तीरंदाज़ों को घोड़ों से उतरकर लड़ने का हुक्म दिया और खुद मैदान के बीचोंबीच मोर्चा संभाला।

जब मंगोलों ने छल से भूसे के पुतलों को घोड़ों पर बैठाकर अपनी तादाद ज़्यादा दिखाने की कोशिश की, तब भी जलालुद्दीन धोखे में नहीं आए। आख़िरकार उन्होंने ख़ुद हमला बोलकर मंगोलों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। यह चंगेज़ ख़ान की सेना की शुरुआती बड़ी हारों में से एक थी और पहली बार लोगों को यक़ीन हुआ कि मंगोल अजेय नहीं हैं।

लेकिन अफ़सोस, जिस फ़ौज ने मंगोलों को हरा दिया था, वही माल-ए-ग़नीमत के बँटवारे पर आपस में बिखर गई। कई सरदार उनका साथ छोड़ गए। यही बिखराव आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन गया।

इसके बाद सिंध दरिया के किनारे इतिहास का वह मंज़र सामने आया, जिसे आज भी बहादुरी की मिसाल माना जाता है। चंगेज़ ख़ान ने उन्हें चारों तरफ़ से घेर लिया था। जब बच निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा, तो जलालुद्दीन ने घोड़े समेत ऊँची चट्टान से सिंध नदी में छलांग लगा दी और दूसरी तरफ़ निकल गए। कहा जाता है कि उनकी यह जुर्रत देखकर ख़ुद चंगेज़ ख़ान भी दंग रह गया और उसने अपने बेटों से कहा, "हर बाप को ऐसा ही बेटा नसीब होना चाहिए।" यह घटना आज भी इतिहास की सबसे साहसिक सैन्य घटनाओं में गिनी जाती है।

मगर जलालुद्दीन की सबसे बड़ी लड़ाई चंगेज़ ख़ान से नहीं, बल्कि अपनों की बेरुख़ी से थी। उन्होंने मंगोलों के ख़िलाफ़ मुस्लिम हुक्मरानों से मदद मांगी, लेकिन ज़्यादातर ने अपने-अपने सियासी फ़ायदे को तरजीह दी। अगर उस दौर में मुस्लिम सल्तनतें एकजुट हो जातीं, तो शायद तारीख़ का रुख़ कुछ और होता।

1231 में कुर्दिस्तान के पहाड़ों में उनकी हत्या कर दी गई। न उनका कोई आलीशान मक़बरा है, न कोई बची हुई सल्तनत। लेकिन आज, लगभग आठ सौ साल बाद भी, दुनिया उन्हें उस बादशाह के तौर पर याद करती है जिसने हार तय होने के बावजूद ज़ुल्म के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया।

सुल्तान जलालुद्दीन मंगबरनी हमें यह सिखाते हैं कि बहादुरी का मतलब हमेशा जीतना नहीं होता। कभी-कभी बहादुरी का मतलब यह होता है कि जब पूरी दुनिया हार मान चुकी हो, तब भी इंसान हक़ और इज़्ज़त की ख़ातिर आख़िरी सांस तक डटा रहे। शायद यही वजह है कि उनका नाम आज भी चंगेज़ ख़ान के सबसे दिलेर मुक़ाबिलों में लिया जाता है।

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Maroof Ahmed Khan

Maroof Ahmed Khan जनता का संदेश के संस्थापक एवं प्रधान संपादक हैं। वे जनसरोकार, निष्पक्ष रिपोर्टिंग और जनता की आवाज़ को प्रमुखता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।