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सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के इंतजार में 25 केस:इनमें मुस्लिमों को 5% आरक्षण, वाट्सएप की निजता जैसे मामले भी शामिल

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 25 अक्टूबर 2026 👁️ 2 बार पढ़ा गया
प्रकाशक: जनता का संदेश
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के इंतजार में 25 केस:इनमें मुस्लिमों को 5% आरक्षण, वाट्सएप की निजता जैसे मामले भी शामिल

सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ के समक्ष सुनवाई के इंतजार में 25 केस लंबित हैं। पंजाब में सिखों के अल्पसंख्यक दर्जे और राइस मिलर्स एवं एफसीआई के विवाद से जुड़े दो केस 16 साल पहले संविधान पीठ को रेफर हुए थे। लेकिन, इन पर सुनवाई के लिए आज तक संविधान पीठ गठित नहीं हुई। इनके अलावा 4 और केस भी 10 साल या इससे ज्यादा समय से लटके हैं।

संविधान पीठ को रेफर किए जाने से पहले ये केस वर्षों छोटी पीठों के पास भी लंबित रह चुके हैं। संविधान पीठ के समक्ष लंबित सभी मामले व्यापक संवैधानिक महत्व से जुड़े हैं। 4 केस आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित हैं। नौकरी, चुनाव, केंद्र-राज्य अधिकार और आर्थिक विवादों से जुड़े 3-3 केस हैं।

2 मामले धर्म-संस्कृति के हैं। मुस्लिम आरक्षण, मुस्लिम विवाह, महिला के संपत्ति अधिकार, डिजिटल निजता के मुद्दे भी सुनवाई के इंतजार में हैं। संविधान पीठ को इन मामलों में आरक्षण, राज्यपाल-स्पीकर के अधिकार, निजता जैसे मुद्दों से जुड़े संवैधानिक सवालों का जवाब तय करना है। सुप्रीम कोर्ट में नियमित संविधान पीठ की मांग उठती रही है।

जजों ने भी समय-समय पर इस पर जोर दिया है। 22 केस: 5 सदस्यीय बेंच के इंतजार में सिखों का अल्पसंख्यक दर्जा (16 साल से लंबित)

पंजाब सरकार बनाम साहिल मित्तल केस में कोर्ट को पंजाब सरकार की 2001 की अधिसूचना में सिख समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने की वैधता तय करनी है। भारत सरकार बनाम प्रीति अग्रवाल केस में सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि क्या 1944 के आपराधिक कानून संशोधन अध्यादेश के तहत संपत्ति कुर्क करने की शक्ति संविधान लागू होने के बाद भी वैध है?

असर: अल्पसंख्यक दर्जे से जुड़े अधिकारों पर। अंग्रेजी कानून से कुर्की (7 साल से लंबित)

भारत सरकार बनाम प्रीति अग्रवाल केस में सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि क्या 1944 के आपराधिक कानून संशोधन अध्यादेश के तहत संपत्ति कुर्क करने की शक्ति संविधान लागू होने के बाद भी वैध है?

असर: संपत्ति कुर्क करने की सरकारी शक्ति और संविधान से पहले बने कानूनों की वैधता पर असर पड़ेगा। वाट्सएप की निजता नीति (9 साल से लंबित)

कर्मण्य सिंह सरीन बनाम भारत सरकार केस में तय करना है कि क्या वॉट्सएप की निजता नीति और डेटा साझा करने की सहमति लेने का तरीका संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है?

असर: यूजर्स की डिजिटल निजता और निजी

📡 स्रोत: Dainik Bhaskar

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