सूर्य के मुख वाले चंद्रदेव का प्राचीन मंदिर, करवा चौथ पर उमड़ते हैं श्रद्धालु
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अजमेर जिले के पुष्कर में चंद्र घाट पर स्थित भगवान चंद्रदेव का प्राचीन मंदिर अपनी अनूठी अष्टधातु प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि प्रतिमा में चंद्रदेव के स्वरूप के साथ सूर्य भगवान के मुख की विशेषता दिखाई देती है। करवा चौथ पर भी बड़ी संख्या में महिलाएं यहां पहुंचती हैं।
27 अक्टूबर, अजमेर। राजस्थान के अजमेर जिले के विश्व प्रसिद्ध तीर्थराज पुष्कर में अनेक प्राचीन मंदिर और धार्मिक स्थल मौजूद हैं। इन्हीं में पुष्कर सरोवर के 52 घाटों में से एक चंद्र घाट पर स्थित भगवान चंद्रदेव का प्राचीन मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं और विशेष प्रतिमा के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर करीब 200 वर्ष से अधिक पुराना बताया जाता है। यहां भगवान चंद्रदेव के साथ तपेश्वर महादेव का मंदिर भी स्थापित है।
अष्टधातु की प्रतिमा में चंद्र और सूर्य का अनूठा स्वरूप
मंदिर की सबसे खास विशेषता यहां स्थापित भगवान चंद्रदेव की अष्टधातु निर्मित प्रतिमा है। मंदिर के पुजारी प्रभु दयाल गौड़ के अनुसार, प्रतिमा में भगवान चंद्रदेव अपने हाथों में अमृत कलश धारण किए हुए हैं। कलश के भीतर चांदी का चंद्रमा भी स्थापित है।
पुजारी के अनुसार, प्रतिमा का अर्धचंद्राकार स्वरूप शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की छवि को दर्शाता है। इस प्रतिमा की विशेष बात इसका मुख और उससे निकलने वाली किरणों का स्वरूप है, जिन्हें सूर्य भगवान से संबंधित बताया जाता है। इस तरह प्रतिमा में चंद्र और सूर्य के स्वरूप का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
कार्तिक मास में पूजा और जप का विशेष महत्व
पंडित पुनीत के अनुसार, मंदिर में भगवान चंद्रदेव की प्रतिमा चंद्र और सूर्य की दुर्लभ युति को प्रदर्शित करती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां दर्शन और पूजा-अर्चना करने से भक्तों को ऐश्वर्य और यश की प्राप्ति होती है। उन्होंने बताया कि मंदिर में नियमित रूप से अनुष्ठान होते रहते हैं, लेकिन कार्तिक मास में एकादशी यानी ग्यारस से पूर्णिमा तक के पांच दिनों को विशेष महत्व दिया जाता है। इस दौरान पूजा, तप और मंत्र जाप के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
चंद्र दोष निवारण और मानसिक शांति के लिए होती है पूजा
पंडित सौरभ शास्त्री बताते हैं कि ज्योतिषीय मान्यताओं में चंद्रमा को मन और धैर्य का कारक माना जाता है। इसी मान्यता के चलते मंदिर में चंद्र दोष निवारण और मानसिक पीड़ा से मुक्ति की कामना के साथ विशेष पूजा-अर्चना कराई जाती है। मंदिर में चंद्रदेव की पूजा के साथ दुर्गा स्तोत्र के पाठ सहित अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी होते रहते हैं। सौरभ शास्त्री के अनुसार, यह मंदिर करीब 200 वर्ष पुराना है और इसका निर्माण श्यामलाल तथा सुंदरलाल ने करवाया था। मंदिर परिसर में भगवान चंद्रदेव के साथ तपेश्वर महादेव का मंदिर भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
करवा चौथ पर चंद्रदेव के दर्शन के लिए पहुंचती हैं महिलाएं
स्थानीय निवासी दिनेश पाराशर के अनुसार, पुष्कर सरोवर की धार्मिक मान्यता चारों युगों सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग से जुड़ी हुई है। सरोवर के आसपास अनेक प्राचीन शिवालय और देवालय मौजूद हैं, जिनकी अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान है। इन्हीं में चंद्र घाट स्थित भगवान चंद्रदेव का मंदिर भी शामिल है। उन्होंने बताया कि करवा चौथ के अवसर पर बड़ी संख्या में महिलाएं मंदिर पहुंचती हैं। मान्यता के अनुसार, महिलाएं भगवान चंद्रदेव के दर्शन करने के बाद अपना व्रत खोलती हैं। मंदिर में प्रतिदिन चंद्रदेव के मंत्रों का जाप भी किया जाता है।
आस्था और प्राचीन परंपराओं का केंद्र है चंद्र घाट
तीर्थराज पुष्कर का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व देशभर में प्रसिद्ध है। यहां स्थित प्राचीन मंदिर और घाट सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े हुए हैं। चंद्र घाट का यह मंदिर अपनी विशिष्ट प्रतिमा, चंद्रदेव की पूजा और कार्तिक मास के धार्मिक अनुष्ठानों के कारण पुष्कर की धार्मिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। पुष्कर आने वाले श्रद्धालु यहां भगवान चंद्रदेव और तपेश्वर महादेव के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं। विशेष पर्वों पर मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है और प्राचीन धार्मिक परंपराओं की झलक देखने को मिलती है।
बाइट — प्रभु दयाल गौड़, पुजारी
बाइट — पंडित पुनीत
बाइट — पंडित सौरभ शास्त्री
बाइट — दिनेश पाराशर, स्थानीय निवासी