तुलजा भवानी, पराक्रम शक्ति का रूप:साल में 21 दिन सिंहासन से दूर रहती हैं देवी, दशहरे पर गर्भगृह से बाहर आती है मूल प्रतिमा
ताज़ा खबरों से अपडेट रहने के लिए हमारे WhatsApp चैनल से जुड़ेंJoin करें →महाराष्ट्र के तुलजापुर में देवी भवानी की प्रतिमा नवरात्रि शुरू होने से पहले आठ दिन सिंहासन पर नहीं रहती। पुजारी देवी को उठाकर चांदी के पलंग पर शयन कराते हैं। दशहरे पर इसी मूल प्रतिमा को 108 सूती साड़ियों में लपेटकर पालकी में रखा जाता है। इसके बाद देवी को मंदिर से बाहर लाकर सीमोल्लंघन की रस्म निभाई जाती है।
यहां नवरात्रि में एक नहीं, तीन कलश स्थापित होते हैं। इनके लिए मिट्टी के घड़े धाकटे तुलजापुर के परंपरागत कुम्हार परिवार से आते हैं। मंदिर में देवी के आठ हाथों में हथियार हैं। एक पैर के नीचे महिषासुर है। छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी होने के कारण भवानी को पराक्रम और रक्षा की शक्ति माना जाता है।
यहां पांच दिनों तक देवी के अलग-अलग रूपों की विशेष पूजा होती है। इनमें कृष्ण की बांसुरी और भवानी तलवार वाला रूप भी है। साल में 3 बार देवी की मूर्ति हटा देते हैं, तीन फीट की है अष्टभुजा प्रतिमा गर्भगृह में करीब तीन फीट ऊंची काले पत्थर की देवी प्रतिमा है। यह महिषासुरमर्दिनी रूप है। देवी के आठ हाथों में त्रिशूल, खंजर, बाण, चक्र, शंख, धनुष, पात्र और महिषासुर के बाल पकड़े हुए दिखाए गए हैं।
पीठ पर बाणों से भरा तरकश है। देवी का दायां पैर महिषासुर को दबाए हुए है। बाईं तरफ सिंह की आकृति है। प्रतिमा के पास सूर्य और चंद्रमा भी बने हैं। मुकुट पर शिवलिंग की आकृति है। इस प्रतिमा की खासियत यह है कि इसे सिंहासन से हटाया जा सकता है। इसलिए इसे चल प्रतिमा कहते हैं। साल में तीन बार इसे सिंहासन से हटाकर पलंग पर रखा जाता है।
दशहरे पर इसी मूल प्रतिमा की पालकी यात्रा निकलती है। नवरात्रि से पहले 8 दिन चांदी के पलंग पर शयन; साल में कुल 21 दिन शयन करती हैं देवी तुलजापुर में शारदीय नवरात्रि से पहले देवी को आठ दिन शयन कराने की परंपरा है। इसे मंचकी निद्रा कहते हैं। इस साल यह रस्म 3 अक्टूबर की शाम शुरू हुई थी। अभिषेक और आरती के बाद पुजारियों ने मुख्य प्रतिमा को सिंहासन से उठाकर गर्भगृह के पास शयन कक्ष में चांदी के पलंग पर रखा।
11 अक्टूबर की सुबह देवी को दोबारा सिंहासन पर स्थापित किया गया। धार्मिक मान्यता में इस निद्रा को महिषासुर से युद्ध के पहले देवी के विश्राम और शक्ति संग्रह से जोड़ा जाता है। देवी साल में तीन बार शयन करती हैं। शारदीय नवरात्रि से पहले आठ दिन, दशहरे के बाद पांच दिन और पौष महीने की शाकंभरी नवरात्रि से पहले आठ दिन।
इस तरह कुल 21 दिन देवी शयन करती हैं। नवरात्रि में तीन कलश, परंपरागत कुम्हार परिवार लाता है घड़े; गोमुख और कल्लोल कुंड का जल भरते हैं तुलजा भवानी मंदिर में घटस्थापना के लिए एक नहीं, तीन मिट्टी के कलश आते हैं। इन्हें धाकटे तुलजापुर का परंपरागत कुम्हार परिवार उपलब्ध कराता है। कलशों में गोमुख और कल्लोल तीर्थ का जल भरा जाता है।
मंदिर की परंपरा के पुराने विवरणों में पहला कलश सभा मंडप के उत्तर-पूर्वी हिस्से में, दूसरा देवी के सामने स्थित त्रिशूल वाले स्थान पर और तीसरा मातंगी देवी मंदिर में स्थापित करने का उल्लेख है। इस बार 11 अक्टूबर को दोपहर 12 बजे घटस्थापना हुई। इसके बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ और विशेष पूजा शुरू हुई।
महानवमी पर हवन के साथ कलश पूजा का समापन होता है। दशहरे पर यात्रा के लिए गर्भगृह से बाहर आती है मूल प्रतिमा, 108 सफेद साड़ियों में लपेटते हैं तुलजापुर में दशहरे की सबसे खास रस्म देवी का सीमोल्लंघन है। यह विजय के मौके पर अपनी सीमा से बाहर जाने की परंपरा है। इसके लिए गर्भगृह से मूल प्रतिमा को निकाला जाता है।
पहले देवी का अभिषेक होता है। फिर प्रतिमा को 108 सूती साड़ियों से पूरी तरह लपेटते हैं। यह सामान्य श्रृंगार नहीं है। साड़ियों की कई तह प्रतिमा को पालकी में रखते और उठाते समय नुकसान से बचाने के लिए लगाई जाती हैं। इसके बाद देवी को विशेष पालकी में रखकर मंदिर की परिक्रमा कराते हैं। यात्रा में पुजारी, महंत और दूसरे सेवक शामिल होते हैं।
श्रद्धालु कुंकुम और फूल उड़ाते हैं। पालकी को मंदिर परिसर में पीपल के पेड़ के पास रोककर आरती की जाती है। सीमोल्लंघन पूरा होने पर देवी को फिर पलंग पर रखा जाता है। इसे श्रमनिद्रा कहते हैं। इस साल 21 अक्टूबर को यह रस्म होगी। 26 अक्टूबर को देवी फिर मुख्य सिंहासन पर स्थापित होंगी। सुबह 4:30 बजे शुरू होते हैं दर्शन, 11 बजे श्रृंगार और रात 9:30 पर होती है आखिरी आरती सुबह 4:30 बजे, चरणतीर्थ और काकड़ आरती: देवी की सुबह की पूजा शुरू होती है।
चरणतीर्थ के बाद काकड़ आरती की जाती है। सुबह 6 बजे, पंचामृत अभिषेक: देवी की मूल प्रतिमा पर शहद, केला, शक्कर, नींबू और दही चढ़ाते हैं। इसके बाद गोमुख तीर्थ के जल से स्नान कराया जाता है। सुबह 6 से 10 बजे, भक्तों की अभिषेक पूजा: सबसे पहले कोल्हापुर के छत्रपति संस्थान से आया दूध मूल प्रतिमा पर चढ़ता है।
इसके बाद भक्तों के अभिषेक देवी के सामने रखी चांदी की पादुकाओं पर होते हैं। इसी समय पांच विशेष सिंहासन महापूजाएं होती हैं। हर पूजा में दूध, दही, श्रीखंड, आमरस या गन्ने के रस में से किसी एक की 70 लीटर सामग्री इस्तेमाल होती है। सुबह 11 बजे, वस्त्रालंकार और आरती: देवी को वस्त्र और आभूषण पहनाकर श्रृंगार करते हैं।
इसके बाद आरती और धूपारती होती है। शाम 7 से रात 9 बजे, अभिषेक पूजा: भक्त दोबारा अभिषेक कराते हैं। इस दौरान दो विशेष सिंहासन महापूजाएं होती हैं। अभिषेक के बाद आरती और धूपारती होती है। रात 9:30 बजे, वस्त्रालंकार और प्रक्षाल पूजा: देवी के श्रृंगार के बाद आरती और धूपारती होती है। फिर प्रक्षाल पूजा में गर्भगृह और सिंहासन की सफाई होती है।
📡 स्रोत: NewsData.io