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वैशाली नाव हादसा-13 बच्चों की मौत के बाद बड़ा सवाल:नाव में पहले से छेद,फिर आपदा कार्य में क्यों इस्तेमाल हुई; जानिए किस स्तर पर हुई चूक

लेखक: JKS News Desk अंतिम अपडेट: 16 अक्टूबर 2026
प्रकाशक: जनता का संदेश
वैशाली नाव हादसा-13 बच्चों की मौत के बाद बड़ा सवाल:नाव में पहले से छेद,फिर आपदा कार्य में क्यों इस्तेमाल हुई; जानिए किस स्तर पर हुई चूक

वैशाली के राघोपुर में गंगा नदी में नाव पलटने से मंगलवार की शाम 13 बच्चों की मौत हो गई। इस हादसे को लेकर अब प्रशासनिक निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं। DM वर्षा सिंह के मुताबिक, हादसे में इस्तेमाल निजी नाव का अगस्त से सितंबर तक जिला प्रशासन की तरफ से आपदा कार्यों में इस्तेमाल किया गया था। नाव में पहले से छेद था, जिसे स्टील की प्लेट लगाकर बंद किया गया था। मंगलवार को हादसे के वक्त प्लेट हट गई और नाव में पानी भरने लगा। ऐसे में बड़ा सवाल है कि जब नाव की खराब स्थिति की सूचना थी तो उसकी फिटनेस जांच किसने की?

उसे सुरक्षित घोषित किए बिना आपदा कार्यों में कैसे इस्तेमाल किया गया?

बाढ़ के दौरान इस्तेमाल के बाद नाव को दियारा क्षेत्र में चलने से रोकने या उसकी सुरक्षा जांच की क्या व्यवस्था थी?

हादसे के बाद प्रशासन ने निजी नावों के सर्वे, फिजिकल वेरिफिकेशन और रेजिस्ट्रेशन के निर्देश दिए हैं, लेकिन अब जांच के घेरे में यह भी है कि हादसे से पहले निगरानी में कहां और किस स्तर पर चूक हुई। घटना से जुड़ी तस्वीरें देखिए… नाव निजी थी, लेकिन आपदा कार्यों में प्रशासन ने किया था इस्तेमाल जिला प्रशासन के अनुसार, जो नाव पलटी, वह सरकारी नहीं, बल्कि पर्सनल थी।

राघोपुर में बाढ़ और आपदा कार्यों के लिए छह सरकारी नावों के अलावा निजी नावों का इस्तेमाल जुलाई से लेकर सितंबर तक किया गया था। इसके लिए प्रशासन ने निजी नाव मालिकों के साथ एग्रीमेंट किया था। प्रशासन के बयान के मुताबिक, नाव में पहले से छेद था। उसे स्टील की प्लेट लगाकर बंद किया गया और ऊपर से रंग दिया गया था।

हादसे के समय प्लेट हट गई, जिससे नाव में पानी भरने लगा। प्रशासन ने क्षमता से अधिक लोगों के सवार होने और नाव का संतुलन बिगड़ने को भी हादसे की वजहों में शामिल किया है। नाव की स्थिति पहले से खराब थी, तो यह पता लगाना जरूरी है कि उसे आपदा कार्यों में इस्तेमाल करने की अनुमति किस आधार पर दी गई थी?

जांच में नाव मालिक और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के बीच हुए समझौते, निरीक्षण और मरम्मत से जुड़े रिकॉर्ड की पड़ताल भी जरूरी है। प्रशासन ने माना- सूर्यास्त के बाद नाव चलाने पर रोक थी अधिकारियों ने यह भी माना कि नियम के अनुसार सूर्यास्त के बाद नाव चलाने की अनुमति नहीं थी, लेकिन हादसे के समय इस नियम का उल्लंघन किया गया। ऐसे में सवाल ये उठता है कि रात करीब 8:30 बजे नाव नदी में कैसे चल रही थी?

क्या घाट या दियारा क्षेत्र में नावों के परिचालन की निगरानी के लिए कोई अधिकारी या पुलिसकर्मी तैनात नहीं थे? क्या नावों के आने-जाने का रजिस्टर नहीं रखा जाता था?

अगर निगरानी की व्यवस्था रहती तो शायद इस नियम का उल्लंघन नहीं होता?

DM वर्षा सिंह ने ये भी कहा कि नाव को चप्पू के बजाय हाथों से आगे बढ़ाया जा रहा था। ऐसे में नाव का संतुलन बिगड़ने की आशंका भी जताई गई है। दियारा के लोगों के लिए नाव ही सहारा, फिर फिटनेस की जांच क्यों नहीं?

भक्तान टोला की आबादी करीब 4,500 है। गांव में कुछ लोगों का घर गंगा के दियारा क्षेत्र के उस पार हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, वहां तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क नहीं है। बाढ़ के दौरान जुलाई से अक्टूबर तक पानी रहने के कारण नाव ही आने-जाने का प्रमुख साधन है। ग्रामीणों को हाट-बाजार जाने, अस्पताल पहुंचने और रोजमर्रा के काम के लिए नाव ही सहारा है।

पानी उतरने के बाद भी कई महीनों तक लोगों को पैदल नदी पार करनी पड़ती है। इस बार भी बाढ़ का पानी पूरी तरह नहीं उतरा था। वैकल्पिक पगडंडी पर पानी और कीचड़ है। इससे बचने के लिए बच्चे नाव पर सवार हुए थे। ऐसे इलाके में नाव सिर्फ परिवहन का साधन नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जरूरत है। इसी वजह से उसकी फिटनेस, क्षमता और परिचालन के समय की निगरानी और भी जरूरी हो जाती है।

सवाल है कि जब प्रशासन को पता था कि दियारा के लोग नाव पर निर्भर हैं, तो वहां चलने वाली नावों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था थी?

क्या सभी नावों की लिस्ट तैयार थी? क्या उनकी क्षमता तय की गई थी? क्या जर्जर नावों की पहचान कर उन्हें परिचालन से बाहर रखने का कोई इंतजाम था?

यदि लोगों के पास सुरक्षित विकल्प नहीं है, तो प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। केवल हादसे के बाद निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं होगा। दियारा क्षेत्र में नियमित निगरानी और सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था भी जरूरी है। ग्रामीणों का दावा- तीन साल पहले भी की थी शिकायत सुरेश राय ने नाव की हालत को लेकर भी सवाल उठाए।

उन्होंने कहा, “करीब तीन साल पहले ही हमने प्रशासन से नाव की खराब हालत की शिकायत की थी। हर बार आश्वासन दिया जाता था कि नाव की मरम्मत करा दी जाएगी या उसे बदल दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। न नाव बदली गई और न ही उसकी मरम्मत कराई गई। नाव के रखरखाव के नाम पर हर साल पैसे पास होने की बात कही जाती थी, लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।

हमारी शिकायत पर समय रहते ध्यान दिया गया होता, तो शायद यह हादसा नहीं होता। नाव पर पांच से दस लोगों के बैठने की क्षमता थी, लेकिन उस पर करीब 30 लोग सवार थे। नाव किनारे से लगभग 200 फीट दूर पहुंची थी, तभी उसमें पानी भरने लगा और वह पलट गई। सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि किसी को संभलने का मौका ही नहीं मिला।

” हालांकि, जिला प्रशासन का कहना है कि नाव की मरम्मत या खराब हालत को लेकर अंचल कार्यालय और जिला कार्यालय में कोई लिखित शिकायत नहीं मिली थी। निगरानी की प्रभावी व्यवस्था नहीं थी जिला अधिकारी वर्षा सिंह ने माना कि दियारा क्षेत्र में नावों के परिचालन की निगरानी के लिए प्रभावी स्थानीय व्यवस्था नहीं थी।

स्थानीय प्रशासन और पुलिस की जिम्मेदारी थी कि नावों के परिचालन पर नजर रखी जाए। इसी मामले में अंचल अधिकारी (CO) और थानाध्यक्ष पर कार्रवाई की बात कही गई है। प्रशासन ने हादसे के कारणों, बचाव, स्वास्थ्य सेवाओं की प्रक्रिया की जांच के लिए समिति गठित करने की भी बात कही है। अब 13 बच्चों की मौत के बाद जागा प्रशासन?

हादसे के बाद जिला प्रशासन ने निजी नावों का सर्वेक्षण,फिजिकल वेरिफिकेशन और रेजिस्ट्रेशन कराने के निर्देश दिए हैं। नावों की स्थिति, उनकी क्षमता और सुरक्षा मानकों की जांच की जाएगी। जर्जर और परिचालन के अयोग्य नावों को चलाने पर रोक लगाने की बात कही गई है। जिन नावों की मरम्मत संभव होगी, उनकी मरम्मत के बाद फिटनेस जांच कराने के निर्देश भी दिए गए हैं। प्रशासन ने सूर्यास्त के बाद नाव चलाने, क्षमता से अधिक यात्रियों को बैठाने और बिना पंजीकरण वाली नावों के परिचालन पर सख्ती करने की बात कही है। अनुमंडल स्तर के अधिकारियों को नियमित निरीक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी देने की भी बात सामने आई है।

📡 स्रोत: NewsData.io

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