Xप्लेन: भारत के बैंकों में CEO की किल्लत क्यों? दुनियाभर में भारतीय संभाल रहे कमान
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भारत के लोग दुनिया के सबसे बड़े बैंकों और कंपनियों को चला रहे हैं, लेकिन अपने ही देश के बैंकों को अगला CEO ढूंढने में पसीने छूट रहे हैं. ये भारत की बैंकिंग इंडस्ट्री की आज की सच्चाई है.
दुनिया भर में भारतीय मूल के बैंकरों ने बड़े-बड़े वित्तीय संस्थानों की कमान संभाली है.
ड्यूश बैंक से लेकर सिटीग्रुप और बार्कलेज तक, हर जगह भारतीय मूल के लोग CEO की कुर्सी पर बैठे हैं.
जब बात अपने देश की आती है, तो तस्वीर पूरी तरह से उलटी दिखती है. लेकिन क्यों, कैसे और इसका हल क्या है...
भारतीय प्राइवेट बैंकों को नहीं मिल रहे CEO
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, ये बात सिर्फ किसी एक बैंक की नहीं है, बल्कि पूरे सेक्टर की समस्या बन चुकी है.
हाल ही में देश के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक HDFC बैंक के CEO सशिधर जगदीशन ने अचानक ऐलान किया कि वो अपना कार्यकाल बढ़ाना नहीं चाहते. इसके बाद बैंक को सिर्फ दो महीने के अंदर नया CEO ढूंढना है.
दूसरी तरफ कोटक महिंद्रा बैंक भी तीन साल के अंदर दूसरी बार CEO की तलाश कर रहा है.
दोनों बैंकों के पास अपना कोई वारिस तैयार नहीं था, जिसकी वजह से ये प्रोसेस बेहद मुश्किल हो गई है.
आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत में बैंकिंग टैलेंट की कोई कमी नहीं है, लेकिन जब बात बड़े संस्थान को चलाने की आती है, तो उस लायक अनुभव वाले लोगों की संख्या बहुत कम हो जाती है.
ग्लोबल एग्जीक्यूटिव सर्च और लीडरशिप एडवाइजरी फर्म स्पेंसर स्टुअर्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 30 महीनों में 30 बड़े प्राइवेट बैंकों और NBFC में से 17 ने अपने CEO बदले हैं.
इनमें से करीब 60% नियुक्तियां बाहर से की गई थीं.
इसका मतलब ये है कि बैंकों के पास अपने अंदर ही अच्छे लीडर तैयार नहीं हो पा रहे और उन्हें बाहर से लोगों को लाना पड़ रहा है.
इस उलझे मामले की पूरी कहानी क्या है?
केडिया एडवाइजरी के डायरेक्टर अजय केडिया कहते हैं कि भारत की बैंकिंग इंडस्ट्री अब पहले जैसी नह
📡 स्रोत: ABP Live Vyapar
🎙️ जनता का संदेश का मत
भारत में विदेशी कंपनियों के CEOs में भारतीयों की सफलता प्रशंसनीय है, परन्तु अपने ही बैंकिंग क्षेत्र में नेतृत्व की कमी चिंताजनक है। यह हमें यह सिखाती है कि ज्ञान और अनुभव को देश में भी लगाना आवश्यक है। युवाओं को वित्तीय शिक्षा, उद्यमिता प्रशिक्षण और स्थानीय नौकरी के अवसरों पर ध्यान देना चाहिए। समाज को एकजुट होकर बैंकिंग में नवाचार और पारदर्शिता को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि देश की आर्थिक शक्ति स्वयं के हाथों में रहे।